Saturday, 5 September 2015

शिक्षक और गुरु

 कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को शिक्षक दिवस के उपलक्ष्य में बच्चों के साथ बातचीत करते सुना और बाद में एक प्रश्न में उलझ गया कि क्या शिक्षक और गुरु एक ही है? इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए मैंने अपने बचपन से लेकर अभी तक के शिक्षको को याद करने की कोशिश की और यह एहसास किया की शिक्षक गुरु हो सकता है पर किसी गुरु को सिर्फ शिक्षक समझ लेना ग़लत होगा। हज़ारों में से मुट्ठीभर शिक्षक आपको गुरु मिलेंगे। शिक्षक हमें सिर्फ वह बताता है जिसे बताने के वह बुलाया जाता है यहां मेरा मतलब उन टीचरो से है जो सीमित पाठ्यक्रम पढाने जाते है और शिक्षा का प्रसार से ज्यादा अपने(कोचिंग) प्रचार पर विश्वास करते है जबकि गुरु अध्ययन से आगे जाकर जिन्दगी की हक़ीकत से भी रूबरू कराता है । शिक्षक हमें सिर्फ रट्टू तोता बनाता है कक्षाए पास करवाता है डीग्रीयां दिलवाता है वहीं गुरु हमें बोध कराता है और जीवन में आने वाली बाधाओ से निपटने के गुर सिखाता है । हमारे आस-पास मौजूद तमाम लोग,प्रकृति में व्यवस्थित हर चीज़ छोटी या बड़ी,जिससे हमें कुछ सीखने को मिले,उसे हमें गुरु समझना चाहिए और उससे एक शिष्य के नाते पेश आना चाहिए। आजकल देखता हूं कि टीचर्स पढ़ाते हैं,किताबों का रट्टा लगवाते हैं या फॉर्मूला से सवाल हल करना सिखाते हैं। यह तो पढ़ाना हुआ, गढ़ना नही। गुरु पढ़ाता नहीं, गढ़ता है। गढ़ने से मतलब है सवाल के जड तक जाये और फिर समझाए। गुरु का काम यही है तपाकर उसे एक आकार देकर भविष्य के लिए तैयार करना,ताकि शिष्य कहीं मात न खाए और जीवन में हमेशा चमकता रहे।
शायद इसका एक जवाब यह भी हो सकता है कि प्राचीन काल में गुरुकुल ही ऐसा स्थान था जहां बचपन में ही बालक जाते थे और जीवन जीने के सारे दांवपेंच सीख कर आते थे। वर्तमान युग में इसकी जगह कॉन्वेंट और बोर्डिंग स्कूलों ने ले ली है और हम शिक्षक को ही गुरु समझने लगे है। परंतु गुरुकुल में शिक्षा पूरी होने के बाद गुरुद्क्षीणा(फीस) दी जाती था परंतु आज के समय में अध्यापन एक बिज़नेस,एक प्रोफेशन भर रह गया है। पहले पैसा लेना और फिर पढ़ाना। प्रीपेड सर्विस हो गई है। और अगर इतिहास पर नजर दौडाए तो शिक्षा में भी किस तरह अंतर आया है यह भी किसी से छुपा नहीं है। यह अंतर ही है जो कि प्राचीन युग में शिवाजी, भरत, ध्रुव जैसे इतनी कम आयु में आदर्श बन गये वही आज का युवा 24-27 साल अपने शिक्षा में लगाने के बाद भी दर दर की ठोकरे खा रहा है क्योकि वह सिर्फ टीचरो से मिल रहा है गुरु से नहीं। स्कुली शिक्षा की अपेक्षा कॉलेज में मुझे ज्यादा गुरु मिले और आजकल तो एक गुरु द्वारा ऐसी जगह पहुंच गया हूं जहां गुरुओ के ज्ञान का भंडार है।
 डीग्री दिलवाने के लिए टीचरो का और जीवन का पाठ पढाने के लिए सभी गुरुजनों को कोटी कोटी नमन।