Saturday, 21 March 2015

एक नक़ाब

मनुष्य भी कितना अजीब है अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए हमेशा एक नक़ाब ओढ़े रखता है तभी  तो घर में  कुछ और, और बाहर कुछ और।  हालाँकि मानव प्रवृति ही कुछ ऐसी  है अपने आपको बेहतर  दिखाने के लिए झूठे पहनावे , खानपान के साथ साथ घर से निकलते ही दुसरो से विनम्रता से पेश आना , न चाहते हुए भी झूठी मुस्कान के साथ मिलना , हाथ मिलाना और जाते जाते मिल के अच्छा लगा जैसे झूठ बोलते है बेशक अंदर ही अंदर उसे कोस ही क्यों  न रहे हो।

हमेशा मुस्कुराने वाला व्यक्ति खुशमिज़ाज , हसमुख होने के बजाय शातिर , चालाक , खतरनाक ही नहीं खलनायक भी हो सकता है। तभी तो माला जपने वाले धर्मगुरु भी कालेकारनामे करते हुए देखे जाते है। कई बार तो इंसान जरुरत से ज्यादा विनम्रता से पेश आता है  और तारीफों के पल  बंधता है  तो समझिए मामला गड़बड़ है।  इस तरह की  तारीफे सुन कर कभी कभार हसी आती है की कैसे कोई इतना झूठ बोल सकता है।

वास्तव में अपने आप को बेहतर साबित करने के चक्कर में अपनी एक झूठी  छवि पेश करता है इस तरह वह सामने वाले के साथ साथ खुद को भी धोखा देता है। तभी तो कहते है जो दिखता है वो होता नहीं और जो  होता है वह दिखता नहीं। 

Sunday, 1 March 2015

बजट और अच्छे दिन

बजट जिसे देखने के लिए एक होड़ सी मच गयी थी ऐसा नज़ारा तो बचपन में भारत पाकिस्तान के मैच में देखने को मिलता था।  कल हर किसी की निगाहे बजट पर ही थी मध्यम वर्ग तो कुछ ज्यादा ही उत्सुक था ये देखने के लिए की किस तरह अच्छे दिन आने वाले है। 
   शुरुआत हुई अपनी वाह वाही लूटते हुए की किस तरह जन धन योजना से करोडो  लोगो का खाता खोला, कोयले की नीलामी और स्वच्छ भारत अभियान से कैसे देशहित में काम किया।  गरीबी रेखा से निचे वालो के लिए जनधन आधार मोबाइल , गरीबी उन्नमूलन ,  20,000 गावों में बिजली पहुचना , सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा  बीमा योजना , अटल पेंशन योजना , प्रधानमंत्री जीवन बीमा , मनरेगा आवास को सड़क तक जोड़ना जैसी योजना सुन कर मन में और उत्त्सुकता जागी और इंतज़ार था मध्यम वर्ग के लिए पिटारे में से कुछ निकलने का परन्तु अब सुनने को मिला कृषि से आय , निजी निवेश , मेनुफैचरी में पिछड़ापन, सरकारी घाटा काबू करना और योजनाये बरकरार रखना आदि सरकार के सामने चुनौतियां है।  तभी कुछ कुछ समझ में आया की कुछ ख़ास नहीं है हमारे लिए। फिर भी उम्मीद बांधे टीवी के आगे आँख गढ़ाए बैठा रहा। 
        रक्षा क्षेत्र ,  स्वास्थ्य ,शिक्षा , आवास शहरी विकास, नमामि गंगे आदि का हिस्सा  देने के बाद कम्पनी कर में 5 फीसद की कमी करना, संपत्ति कर खत्म करते हुए 1 करोड़ से अधिक की आय वालो पर 2 फीसद कर में वृद्धिं करना आदि  समझा रहा था की कैसे कॉपरेटो  की मदद की जा रही है अब मध्यम वर्ग के लिए आयकर में बिना फेर बदल करते हुए सेवाकर में 2 फीसद वृद्धि का फरमान सुनाया तभी दिमाग में ख्याल आया की क्या इसी का मैं  इंतज़ार कर रहा था मतलब खाना - पीना, इंटरनेट ,मोबाइल बिल , केबल जैसी सभी चीजे महंगी।  इतने में सुनने को आया आया की 'मिडिल क्लास अपना ख्याल खुद रखे' ये काफी था घाव पर नमक जैसा काम करने के लिए और समझ आने लगा की चुनाव से पहले 'अच्छे दिन आने ' की बात किस के लिए थी।