इन दिनो अगर मौका मिले तो पश्चिमी दिल्ली के टैगोर गार्डन, तीतारपुर गांव की तरफ जरुर आयेें। आप सबको बुलाने का उद्देश्य सिर्फ इतना है ताकि जिस रावण मेघनाद और कुंभकरण के पुतलों को हम दशहरा के दिन दहन करते है। और आतिशबाजी के साथ आनंदित होते है लोग पुतले दहन के समय अपना हर्ष तालियों की गड़गड़ाहट के साथ व्यक्त करते हैं। लेकिन इन पुतलों को बनाने वाले हाथ कौन से हैं वह कौन हैं, जो इस कारीगरी को अंजाम दे रहे हैं इसे जानने के लिए आपको यहां आना पडेगा
राजौरी गार्डन और सुभाष नगर के बीचोबीच एक इलाका बसा है - तितारपुर। कहा जता है कि जब से यह इलाका बसा है, तभी से यहां रावण के पुतलों का निर्माण हो रहा है। यहां पहले एक ‘रावण वाले बाबा’ हुआ करते थे। उन्होंने ही रावण के पुतलों को बनाने की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे उनके सान्निध्य में कई लोगों ने रावण के पुतले बनाने की कला सीख ली। यहां 5 फुट से लेकर 60 फुट तक के पुतले बनाये जते हैं। यहां 50 से अधिक ग्रुप पुतलों के निर्माण में जुटे हुए हैं।क्या डिवाइडर क्या फुटपाथ जहां तक नज़र जाती है वहां रावण ही रावण के पुलते नज़र आते हैं। कहीं मुकुट तो कहीं मुंछ तो कही धड तैयार हो रहे है। रावण के हंसते हुए चेहरे रखे हैं तो कहीं पेड़ों के बीच धड़ सूखने के लिए रखे गए हैं। मेट्रो ट्रैक के नीचे डिवाइडरों पर इन्हें विशेष तौर पर सजा कर रखा गया है।
रावण मण्डी के रावण पुतले न केवल दिल्ली व देश के अन्य राज्यों में जाते हैं बल्कि विदेशों मे भी इन पुतलों की सप्लाई होती है। इस बार भी तितारपुर से 8 रावण के पुतले ऑस्ट्रेलिया भेजे गए हैं। पुतले बनाने का काम दशहरे से एक महीने पहले ही शुरू हो जाता है जिसमें लगभग 800-1000 कारीगर शामिल होते हैं। 5 फुट से 60 फुट तक मिलने वाले पुतले 1000 रुपए से लेकर 60000 तक के बिकते हैं।

पुतले निर्माण से जुड़ी समस्याओं पर शंकर रावण वाला कहते हैं, ‘आज महंगाई सबसे बड़ी समस्या है। बांस, तार, धोती, रंगीन कागज, पेंट के दाम आसमान छू रहे हैं। आटा महंगा होने से लेई भी महंगी पड़ रही है। दो वर्ष पहले बांस की एक कोड़ी (20 बांस) जो 350 से 400 रुपये में मिला करती थी, अब 700 रुपये से अधिक में मिल रही है। परंतु इतनी महंगाई के बाद भी पुतलों की कीमत में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। कई बार तो मेहनताना भी मुश्किल से ही निकल पाता है।

