Thursday, 31 October 2019

एकता का संदेश देता महापर्व छठ


दिपावली और उसके साथी पर्व यानि कि गोवर्धन पूजा, भैयादूज के समापन के साथ ही बिहार राज्य में मनाये जाने वाले महापर्व छठ की तैयारी शुरू हो जाती है... गली मोहल्ले में छठ के गीत सुनते ही घाट, दीप, अर्घ देती व्रती, गन्ना, घाट की सजावट आदि न जाने कितनी ही चीजें आंखों के सामने आ जाती है...

लोक आस्था का महापर्व छठ चार दिन का त्योहार होता है..,  जो कि कार्तिक मास कि शुक्तल चतुर्थी से शुरु होकर सप्तमी तक चलता है... इस महापर्व के पहले दिन को नहाय-खाय कहते है जिसमे छठ व्रती नहा-धोकर शुद्ध खाना खाती है... जिसमें दाल-चावल, कद्दू (घीया) की सब्जी, गाय का दूध आदि का सेवन करती है... खाने में लहसुन-प्याज, मांस आदि विशेष रूप से प्रतिबंधित होता है...

महापर्व के दूसरे यानि कि पंचमी को खरना कहते है जिसमे व्रती पूरे दिन निराजल व्रत करती है और शाम को नहा-धोकर खीर का प्रसाद बनाती है... यह खीर का प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर दूध चावल और गुड़ से बनाया जाता है... छठ व्रती शाम को पूजा-अर्चना करने के बात एकांत में प्रसाद ग्रहण करती है... साथ ही आस पड़ोस के लोगों और परिजनों को प्रसाद बांटा जाता है... इस दिन व्रती जमीन पर चटाई और साफ चादर बिछा कर सोती है...

महापर्व के तीसरा दिन षष्ठी को मनाया जाता है जिस दिन छठ व्रती दिन भर निराजल व्रत कर शाम के अर्घ की तैयारी करती है... जिसमे प्रसाद के लिए ठेकुआ, सांच (आटा और चीनी के साथ बनी एक मिठाई),  मालपुआ,गुजिया, चावल का लड्डू और खाजा आदि घर पर बनाती है... शाम के वक्त व्रती परिवार के साथ छठ घाट पर पहुंती है... घर के पुरुष-बच्चे दो-तीन बड़ी बांस की टोकरी में सूप, पानी वाला नारियल, गन्ना, लोटा, लाल सिंदूर, धूप, बड़ा दीपक, चावल, थाली, दूध, गिलास, अदरक और कच्ची हल्दी, केला, सेब, सिंघाड़ा, नाशपाती, मूली, आम के पत्ते, शकरगंदी, टाब नींबू (मीठा नींबू), मिठाई, शहद, पान, सुपारी, कुमकुम और चंदन आदि अनेक पूजा के इस्तेमाल में आने वाले सामान को सिर पर रख कर लेकर घाट तक जाते है...  व्रती कमर भर पानी में खड़े रह कर डूबते हुए सूर्य को अर्घ देते हुए प्रसाद अर्पण करती है... सूर्य अस्त के बाद घर आकर निराजल ही जमीन पर चटाई चादर आदि बिछा कर आराम करती है...
छठ महापर्व का चौथा और आखिरी दिन सप्तमी के दिन होता है जिस दिन व्रती सूर्य उदय से पहले है पिछली शाम की तरह सपरिवार पूरे सामान-प्रसाद के साथ घाट पर जाती है... और कमर भर पानी में खड़े हो कर सूर्य उदय का इंतजार करती है, प्रार्थना करती है... और उगते हुए सूर्य को अर्घ देती है.. प्रसाद अर्पण करती है... और अपने घर-परिवार कि खुशहाली की प्रार्थना करती है... बाद में कथा सुनने के बाद प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही इस चार दिवसीय पर्व का समापन होता है...


छठ पर्व महापर्व इसलिए भी बन जाता है क्योंकि इसमें समाज के सभी वर्गो के लोगो के योगदान के बिना यह पर्व असंभव है... बांस के सूप डाला के लिए डोम, मिट्टी के दिये, मटके के लिए कुम्हार, नहाय-खाय से पूर्व नाखून आदि कटवाने के लिए नाई आदि लोगों की जरूरत होती है... यह पर्व समाज के सभी वर्गो को एक साथ लाता है जहां व्रती किसी भी जाति-वर्ग का हो सबके लिए समान ही होता है... एक ही नदी, तालाब पोखर में सभी जाति-वर्ग के लोग खड़े होकर अर्घ देते है... यह पर्व समाज में ऊंच-नीच और भेदभाव को खत्म करता है और एकता का संदेश देता है... शायद तभी यह पर्व बिहार के साथ-साथ भारतवर्ष के अनेक राज्यों में और यहां तक कि विदेशों में भी अपनी जगह बना पाया है....


Saturday, 3 August 2019

क्रश, प्यार और धोखा


हे ड्यूड आय एम इन रिलेशनशिप विद..., यार आय एम डिप्रेस्ड, मेरा ब्रेकअप हो गया, ही शी चीटिड विद मी... मैंने उसे इतना चाहा था... बट वो ये डिजर्व ही नहीं करता था/ करती थी... ब्लाह... ब्लाह... ऐसा अकसर आपने अपने दोस्तों के मुंह से सुना होगा... ये भी संभव है कि आपने भी कभी न कभी अपने दोस्त को ये बात बोली हो... मैंने अपने बहुत दोस्तों को रिलेशनशिप में जाते हुए और कुछ समय बाद ब्रेकअप कर रोते-धोते देखा... हर किसी का किस्सा सुन के ऐसा लगता है जैसे पहले वाले दोस्त का किस्सा रेप्ले कर दिया है... और सबसे मजेदार बात ये होती है कि मेरे किसी दोस्त की (उसकी अपनी नज़र में) गल्ती नहीं होती है... गल्ती हमेशा उसके पार्टनर में होती है...

ब्रेकअप की कहानियों को सुन सुन कर कई सवाल मेरे मन में उठते रहे... उनमें पहला सवाल ये था कि ये प्यार क्या होता है... आज कल हाई स्कूल में आते ही बच्चे ये मेरी गर्लफ्रेंड वो मेरा ब्वायफ्रेंड बोलते क्यों पाये जाते है... कॉलेज में आते आते रिलेशनशिप में क्यों आ जाते है?  अगर कोई इस प्यार रिलेशनशिप में नहीं है तो क्यों वो दूसरे में वो प्यार ढूंढते है... और कोई भी रिलेशनशिप कुछ समय बाद क्यों खत्म हो जाता है... क्यों जिसके साथ इतना समय बिताया, कभी वो ही सबसे प्यारा सच्चा लगता था/लगती थी, अब क्यों वो ही संसार का सबसे बुरा पार्टनर बन जाता/ जाती है....
इन कहानियों में इस प्यार और ब्रेकअप तक के चक्र की शुरुआत होती है क्रश से... माने आपने किसी को देखा और सामने वाला आपको बेहद पसंद आया/आयी... मन ही मन आप अपने साथ उसको देखने की कोशिश करते है... साथ ही यह भी देखते है कि सामने वाले से बात करने पर वह आपसे उसी तरह से पेश आयेगा या नहीं... और जब काफी हद तक आपका जवाब हां में आता है तब आप शुरुआत करते है सामने वाले से बात करने की... दरअसल यहीं पर प्यार का अंकुर फूट चुका होता है... अब अगर सही से इस अंकुर को खाद पानी धूप मिलती रही तो यह पनप पर हरा भरा वृक्ष बन जाएगा और कहीं आधी तुफान आया तो यह अंकुर जिस स्थिती में जब तक सहनशील होगा सहन करता जाएगा अन्यथा कहीं गिर कर दब कर मर जाएगा... अब बारी आती है प्यार के इजहार करने की ताकि आप सामने वाले को बता सके की आप उससे कितनी मोहब्बत करते है... और यहीं अंकुर से जन्मे पौधे पर खाद की जगह तरह तरह के कीटनाशक का प्रयोग करते है... खुद को परफेक्ट दिखाना, सामने वाले की उम्मीदो को पूरा करना.. उसे खुश रखना... कम्प्रोमाइज करना और सामने वाले से भी इन सभी चीजों की उम्मीद करना जैसे अनेक पेस्टीसाइड्स का इस्तेमान करते है... नतीजनन ये पौधा शुरु-शुरु में तो बड़ी तेजी से बढता है लेकिन सही से खाद पानी ना पाने के कारण जल्दी ही मिट्टी में मिल जाता है...

दरअसल शुरुआती दौर रिलेशनशिप बनाने के चक्कर में हम खुद को सामने वाले की सुविधा अनुसार खुद को ढालने की कोशिश करते है... आप और सामने वाले कम्प्रोमाइज करने को तैयार रहते है... जिससे सामने वाले को हम उसी की तरह लगते है, और वो आप में खुद को देख, सामने वाला आपके साथ एक रिलेशनशिप के लिए तैयार हो जाता है... यही कम्प्रोमाइज करना एक बड़ी समस्या को जन्म देता है जो है एक्सपेक्टेशन... और यही एक्सपेक्टेशन इस रिश्ते को अंदर से खोखला करता जाता है जिससे हम अंजान रहते है... और देखते ही देखते इस रिश्ते को खत्म कर देते है... सही मायने में प्यार तो ज़ीरो एक्सपेक्टेशन के सिद्धांत पर काम करता है अगर आपको सामने वाले से ज़ीरो एक्सपेक्टेशन है, फिर तो वो जो भी आपके लिए करता है, वो आपके लिए सरप्राइज है... और कहते है ना छोटी छोटी सरप्राइज से खुशियां बढती है... और खुशियों से प्यार... वहीं इसके उलट अगर आप सामने वाले से कुछ सरप्राइज की इच्छा रखते है और वो पूरी ना हो तो आप बुरा मानते है... गुस्सा करते है... कम्प्रोमाइज करते है जो कि बाद में ज्वालामुखी की तरह फट जाता है और इस रिश्ते को तबाह कर देता है...

हम में से अधिकतर लोग रिलेशनशिप को स्टेटस सिंबल के रूप में देखते है... स्कूल, कॉलेज और ऑफिस में यार-दोस्तों के मज़ाक के पात्र ना बनने के कारण भी प्यार को ढूंढते रहते है... और जो हमें पसंद हो उसे पाने की कोशिश करते रहते है.. और उसे पाने के चक्कर आजकल समाज में लोग कौन कौन से अपराधिक कदम उठा लेते है ये बात तो आप बखूबी जानते है... जबकि प्यार तो एक एहसास है... इस एहसास को पूरा करने के लिए आपको सामने वाले को जबरन पाने की जरुरत नहीं है... आपको इस बात से कतई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि वो आपको प्यार करता है या नहीं... क्योंकि आप जितना सामने वाले को जबरन अपने करीब लाने की कोशिश करोगे वो उतना ही आप से दूर जाता जाएगा... इसलिए जिससे आप प्यार करते हो उसे खुला छोड़ दो... उसे जहां जाना है जाने दो... जिससे मिलना है दो... अगर उसे भी आपसे प्यार है तो वो आपके पास आयेगा ही आयेगा...

यहां समझने वाली एक बात ये भी है कि अगर सामने वाले का किसी से बात करने से, किसी और से हंसी मजाक करने से यदि आपके जहन में उसके लिए कहीं ना कहीं खोने का डर दिखाता है तो दोस्त यह प्यार नहीं आपकी जरुरत मात्र है जिसे आप प्यार समझ रहे है... ये जरूरत भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक किसी भी तरह की हो सकती है... जिसे हम अपने दोस्तों-सहेलियों में मैं इससे प्यार करता हूं/ करती हूं की रट लगाये रहते है... अगर आप भी इसी को प्यार समझते है और इस प्यार को पाने की तालाश में है तो आज से ही अपने सगे संबंधियों के साथ बात करना शुरु करिये... उनके साथ समय व्यतीत करिये और फिर अंतर देखिये...


Wednesday, 8 March 2017

ये कैसा महिला दिवस


आज सुबह से ही अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाओं के ना जाने कितने मैसेज आये है... उन मैसेज और पोस्ट को पढने के बाद सिर्फ एक ही सवाल बार-बार मन में उठ रहा है ये कैसा महिला दिवस? महिला दिवस की शुभकामनाएं वो भी ऐसे समाज में जो पुरुषप्रधान है... जहां महिलाओं को  घर की चार दिवारी में रखा जाता है... जहां महिलाओं को सिर्फ घर संभालने वाली, घर के काम करने वाली समझते है... जहां महिलाओं को असहाय, भोली और फूल सी कोमल समझते है... जहां बहन-बेटी और पत्नी पर पल-पल निगरानी रखी जाती है... कब क्या कर रही है क्या नहीं... क्या पढ़ रही है... कब जा रही है... कब आ रही है..  किससे मिल रही है... किससे बात कर रही है... क्या पहन रही है... कैसे चल रही है... कैसे बोल रही है... कैसे हस रही है... कैसे खा रही है... कैसे बैठी है... कैसे खड़ी है... चारों पहर चौबिसों घंटे उन पर मानसिक रुप से चोट पहुंचाने वाले आज के दिन अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की शुभकामनाएं दे रहे है... और ये महिला दिवस की शुभकामना मिलना महज़ ढोंग-दिखावा भर लगता है... लडकियों के कपड़ो पर सवाल उठाने वालों, उसके हर पल का बही-खाता रहने वालो... सिर्फ एक दिन के लिए हैप्पी वुमेनस डे बोलने वालो ये कैसा महिला दिवस... बस, मैट्रो, कॉलेज और ऑफिस में साथी कर्मचारी, सहपाठी को घूरने वालो, उसे बैचेन करने वालो, और उनकी वर्जीनिटी पर टिप्पणी करने वालों... ये कैसा महिला दिवस... बात बात पर एक दूसरे की मां-बहन की करने वालों, महिलाओं का दायरा तय करने वालों, उनके उठने, बैठने, जागने, सोने, मिलने, खाने, पीने, घूमने का समय तय करने वालों ये कैसा महिला दिवस... इन सारे सवालों को चिंता-फिक्र का नाम देने वालों, परवाह करने की दुहाई देने वालों इस असहज समाज की नींव हमने ही रखीं है... अपने साथ काम करने वाली महिला को इज्ज़त दें, सम्मान दें, उनकी रक्षा करें, तो घर की बहन-बेटियां खुद ही सुरक्षित हो जाएंगी... किसी के भी साथ ना कुछ ऐसा करें और ना ही कुछ होने दें, जो आप अपने बहन,बेटी और पत्नी के साथ न होने देना चाहते हो... सही परवरिश दें, खुद के परवरिश पर यकीन रखें, उसे जो करना हो करने दें, जैसे रहना हो रहने दें, जैसे आप खुद पूरी तरह से आजाद है वैसे ही अपनी बहन, बेटी, पत्नी और दोस्त को आजादी दें... उन्हे भी अच्छे से पता है क्या सही है क्या नहीं... क्या करना चाहिए क्या नहीं... उनके हक की बात करें... उन्हें हक दिलायें... सिर्फ मैसेज भेजने मात्र से तो ये सवाल उठता ही रहेगा कि ये कैसा महिला दिवस...

Monday, 2 January 2017

प्रधानमंत्री जी को खुला खत

आदरणीय प्रधानमंत्री,
आठ नवंबर का आपका भाषण सुना एक पल को सुन कर लगा  कि ये तो मास्टर स्टोक मार दिया आपने... अब तो सारा काला धन एक झटके में बाहर आ जायेगा... सारा न सही कुछ तो आयेगा ही... मै खुद यह मानता हूं और चाहता भी था कि एक बार विमुद्रीकरण हो... सरकार द्वारा बडे नोट बंद किये जाये, आखिरकार आठ नवंबर के भाषण में 500 और 1000 के नोट बंद के फैसले से मैं काफी खुश हुआ... लेकिन 500 और 2000 के नये नोट सुनकर लगा यह क्या... कुछ सोचने पर कई तरह के सवाल मन में उठने लगे... जैसे जैसे दिन बढ़ते गये सवाल और बैचेनी बढ़ती ही गयी...
नोट बंदी के फैसले के बाद अगले दिन बाजार मे तो नोटो का आकाल आ गया... दो दिन एटीएम और एक दिन का बैंक बंद की बात तो आपने ही कहीं थी... खैर मैने आपकी बात भी मानी कुछ एक 100 के नोट थे तो दिन भर का काम चल गया.. बाहर हर कोई हताश परेशान था.. खाने के लिए कैटिन वाला, चाट वाला कोई भी 500 के नोट नहीं ले रहा था... बल्कि दरियादिली दिखाते हुए बाद में देने की बात कहते हुए दिखे... खैर लग रहा था जब बैंक एटीएम खुलेंगे तो ठीक हो जायेगा... नोट मिल जायेंगे सब पहले जैसा हो जायेगा...
आपके फैसले से एक फायदा यह हुआ कि घर में पूरा परिवार बैठकर बात करने लगा... घर आ कर सबसे बात हुई, दिन भर के परेशानी की बात सुनी और  सुनाई... सबसे बडी दिक्कत यह थी कि 7 नवंबर को ही पापा बैंक से 20000 रुपये निकाल कर लाये उसमें भी सारे 1000 के नोट... बहन ने गुल्लक तोडकर उस में से कुछ 100 के नोट निकाले, लगा चलो काफी है 5-6 दिन का खर्चा तो निकल ही जायेगा...
लेकिन असली नजारा तो अभी तक मै देख ही नहीं पा रहा था.. एक महाशय 2000 का नोट ले कर आये बड़े खुश थे... अगले दिन जब मिले तो उतने ही परेशान.. परेशानी का कारण पुछने पर बताया यार 4 घंटे लगा के 2000 का नोट लिया लेकिन यह तो कोई ले ही नहीं रहा..  कारण पूछने पर लगा खुल्ले न होने की सफाई सब दे रहे है... शुक्रवार को छुट्टी के दिन मैं खुद बैक गया कतार इतनी लंबी की हिम्मत ही नही हुई... आखिरकार मैं एटीएम की लाईन में लग गया... 3 घंटे लगने के बाद 2000 निकले, वो भी 2000 का एक नोट... सच बोलूं तो खुशी तो मिली लेकिन वहीं बात वो नोट सिर्फ शो पीस की तरह ही था मेरे पास... कोई खुल्ले ही नहीं दे रहा था बाजार में... जैसे तैसे दिन बिते....
कुछ दिन बाद बैंक गया सुबह 6 बजे ही निकल गया... जाते हुए सोच रहा था कि अभी तो दो चार लोग होंगे अभी से ही जा के देखता हूं क्या पता मिल ही जाये... नंबर आ ही जाए और कोई विकल्प भी नहीं था मेरे पास क्योकि घर में बिल्कुल पैसे नहीं थे.. करीबन साढे ग्यारह बजे तक मेरा नंबर भी आ गया और सबसे अच्छी बात यह रही कि 24000 रुपये मिल गये... वरना लाईन में लगे लोग बता रहे थे कि तीन दिन से आ रहे है लेकिन पैसे नहीं मिल रहे... मिलते भी है तो 3000... लेकिन 24000 देखकर एक बार को तो मैं फिर सातवे आसमान में था.. बैंक वाले ने 100 के 100 नोट दिये और 2000 के सात नोट... मतलब दस हजार के लिए तो गड्डी और चौदह हजार के लिए कुछ सात नोट... क्या 2000 के नोट जारी करने से कुछ सालों में यह भ्रष्टाचार, दहेज प्रथा और नहीं बढ़ जायेगी... रामदेव की एक बात आज भी मुझे याद है, उन दिनों रामदेव योगगुरु स्वामी रामदेव थे... उनका कहना था कि भ्रष्टाचार बंद करना है तो सारे बड़े नोट बंद होने चाहिए औऱ सारी मुद्रा छोटे नोटों में होनी चाहिए। ताकि एक दो लाख में ही नोटो को बोरो में भरने की नौबत आ जाये.. लेकिन पता नहीं अब रामदेव को 2000 के नोट की बात क्यों सही लग रही है...
खैर दिन बीते आते जाते बैंको के बाहर की लाईनें देख कर बुरा लगता था.. ऑफिस आ कर जब खबरें आती थी तो और भी बुरा लगता था... कि कैसे लोग परेशान है... बात सिर्फ परेशानी की ही नहीं है बल्कि परेशानी झेलने के बाद भी लोगों को निराशा ही हाथ लग रही थी... रोते-बिलखते लोग, शादी के घरों में सन्नाटा, लाईन में लगे लोगो की मौत जैसे क्या क्या खबरे नहीं आयी... माननीय प्रधानमंत्री जी आपने सबका साथ सबका विकास की बात कही थी.. लेकिन आपके भाषण को छोड कर कहीं नहीं दिख रहा कि गरीब या मध्यम वर्ग खुश है... आप कहते हो कि गरीब चैन से सो रहा है और बेईमानों की नींद उड़ी है... तो आप ही बताइए हमारा कसूर क्या है.. क्यों लोग एटीएम में दर दर की ठोकर खा रहे है... क्यो आधी रात में उठ कर एटीएम के चक्कर काट रहे है... क्यो लंच टाइम में एटीएम जा रहे है... क्या बेइमानी की है इन लोगों ने... नींद तो इनकी भी खराब हुई... बैंको ने भी माना कि नोटों की किल्लत है... सबको साथ लेकर चलने की बात कहने वाले आप क्यों लोअर मिडिल क्लास और गरीबों को भूल गये... जो रोज काम करके देहाडी लेता है तब कुछ खाता है... बाजार में जब कैश ही नहीं है तो वो कितने दिन मुफ्त में काम करेगा... और क्यो काम करेगा... जो छात्र पढाई करने के लिए अपने राज्यों से दूसरे राज्यों में आये है उनके लिए क्यों नहीं सोचा... जो किराये पर रह रहे है और उन्हें जो घर से निकाला गया उनके लिए आपने क्यों नहीं सोचा... जिन लोगों की जान गयी उन्हें क्या मिलेगा... क्या स्वतंत्रता सेनानी कार्ड के तर्ज पर कोई कार्ड मिलेगा या कोई किसी मेडल या उपाधी से नवाजा जायेगा... हमेशा विकास की राह में इसी वर्ग को क्यों पिसना पड़ता है... काला धन का बडा हिस्सा जहां था वहां से क्या कुछ आया... कितने नेता, अभिनेता और उद्योगपती बैंको की लाईन में लगे... ना ही बदलवाने के लिए ना ही पुराने नोट को जमा करने के लिए... इक्का दूक्का नेता जरुर दिखे...
इन सब के बावजूद सबने आप की बात का समर्थन ही किया है... नोटबंदी का फैसला कैसा है इस पर सबने आपकी तारीफ ही कि है... साथ ही एक शब्द सबके मुह से निकला 'लेकिन'... इसी 'लेकिन' में लोगों के दिल की असल बात थी... फिर भी पता नहीं क्यों लोग ये बात कहने से बचते थे... शायद वो देशद्रोही नहीं बनना चाहते थे... और देश निर्माण में अपना योगदान दे रहें है... प्रधानमंत्री जी आपका यह फैसला एक दम से तो नहीं हो सकता... अपके नेतृत्व पर कतई कोई शक नहीं है... जिस तरह आपने गुजरात मॉडल पेश किया था...  आपके शालन काल में क्या मजाल एक भी खबर मीडिया में आयी हो.. लेकिन आपके हटते ही दो मुख्यमंत्री के चेहरे देख लिये... गुजरातियों का आक्रोश और गुजरात मॉडल सब दिख गया... आपने नोटबंदी काला धन सामने लाने के लिए किया था... लेकिन कितना काला धन सामने आया है आशा है कि बहुत जल्द आप इस का भी खुलासा करेंगे.. 

आपका
दीपक झा









Friday, 23 September 2016

नशा, जुगाड और दिल्ली



पिछले कुछ सालों से देश की राजधानी दिल्ली में एक तबका ऐसा नज़र आ रहा है जिसके सिर पर न छत है, न खाने को रोटी, जैसे तैसे पहनने को कपडे जरुर है। ये तबका आपको सडक किनारे, फ्लाईओवर के नीचे, मेट्रो स्टेशन के बाहर या कुछ एक रैन बसेरे में दिख जाएंगे। अपनी जरुरत पूरी करने के लिए यह चोरी लूट-पाट के साथ साथ गुब्बारे या फूल आदि जैसी चीजें बेचते नजर आ जाएंगे। गंदे बदबूदार कपडे, खुले बाल, मासूमियत के साथ आते जाते लोगो के पैरो में पडते हुए किसी तरह कुछ भी करके बस दो,चार, दस रुपये निकलवाना ही इनका उद्देश्य होता है। इन पैसों से यह अपनी जरुरत कहे, लत कहे या मजबूरी का सामान लेते है। और यही सामान इन्हे एक ऐसे दलदल में ले के जा रहा है जिसका अंदाजा खुद इन लोगो को भी नहीं है।  

सोलुसन सूंघते बच्चे
आज कल नशा एक फैशन बनता जा रहा है जिसे हर वर्ग के लोग अपनी शान समझ के करते है। चाहे वो अमीर हो या गरीब। असल दिक्कत तो इन लोगों के लिए ही है। जिनके पास पैसे तो नहीं हैं लेकिन यह 3-4 साल के बच्चों से ले कर युवा लोग इस कदर नशे का शिकार हो गये है  कि वह अपनी इस जरुरत के लिए कुछ भी कर सकते है। इन्हे नशे के लिए शराब औ्रर हेरोइन जैसे मादकपदार्थ की जरुरत नही होती बल्कि ये कुछ अलग चीजों से ही अपनी तलब दूर करते है जैसे फ्लूड, थीनर, सोलूसन(पेंचर लगाने का केमिकल) इन ची़जों को कपडे के टुकडे में डाल कर मुंह से सांस अंदर की लेते है। और कुछ मिनट के अंदर ही यह बेसुध हो जाते है। अगर आप इन्हे देखना चाहते है तो आपको थोडा जागरुक होने की जरुरत है। यह आपको दिल्ली के किसी भी कोने में बडे ही आसानी के साथ दिख जाऐंगे। चाहे वह क्नॉट प्लेस हो या चांदनी चौक, रेलवे स्टेशन हो या मैट्रो स्टेशन। 

मनोज अपनी दादी के साथ
क्नॉट प्लेस के हनुमान मंदिर के पास लगभग 3 महीने पहले मैंने कुछ बच्चों को आपस में झगडते हुए देखा। उनमें से एक को मैने इशारे से बुलाया।  उससे बात करने पर उसने अपना नाम मनोज बताया। कहा महाराष्ट्र का रहने वाला है यहां 5 साल पहले आया है। मम्मी-पापा नहीं है। दादी खादी ग्रामोद्धोग के आगे भीख मांगती है। और में भी गुब्बारे बेचता हूं। उसके दोस्तों के बारे में पूछने पर कहा कि ये सारे चरसी है। और नशे में है इन्हें चोट नहीं लगती। मैंने पूछा कि नशे के लिए पैसे कहां से आते है, उसने कहा कि ऐसे ही गुब्बारे बेच कर या भीख मांगकर। मनोज ने बताया नशे के लिए भोला, दवाईयां, और इंजेक्शन भी ले लेते है। जब पैसे कम होते है तो सोलूसन सूंघते है। सोलूसन 30 रुपये का आता है और दिन भर चल भी जाता है। इतने में ही वह अपने दोस्तों के साथ भाग गया। पिछले रविवार ऐसे ही गुज़र रहा था कि देखा कि खादी ग्रामोद्धोग के आगे एक लडका लेटा है जिसके आंखें धसी हुई है। पेट अंदर फेफडे दिख रहे है। सूखे से हाथ-पैर सगभग कंकाल जैसा शरीर। लेकिन मन में शंका थी कि कहीं तो देखा है इसे कौन है यह? वापिस आ के देखा तो याद आया ये तो मनोज है और उसकी हालत ऐसी थी कि यकिन करना मुश्किल है कि यह लडका तीन महीने  पहले बिल्कुल ठीक रहा हो, खेल-कूद रहा हो। उसकी दादी से पूछना चाहा पर वह कुछ जबाव ही नहीं देती बस रोते हुए हाथ जोडे पैसे मांगती रहती है। नशा एक दीमक की तरह है जो शरीर को अंदर ही अंदर खा जाती है यह कहना कतई गल्त नहीं है। यह हाल सिर्फ एक मनोज का नहीं है, न जाने कितने ही लोग इसके चपेट में हैं।


पिछले दिनों एक फिल्म ‘उडता पंजाब’ ने पंजाब में नशें की सारी पोल खोल के रख दी। जिस पर वहां के प्रशासन को चौतरफा घेरा गया और आगामी चुनाव में वह राजनैतिक पार्टियों के लिए चुनावी मुद्दा भी बन गया। लेकिन अब देखना है कि दिल्ली में जहां सांसद, विधायक और मंत्री जो खुद को जनता का सेवक बता कर यहां तक आते हैं। उनका ध्यान इन लोगों पर कब जाएगा? पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली में आयी ‘आम आदमी पार्टी’ जो पंजाब में नशे को चुनावी मुद्दा बना रही है। उसका ध्यान दिल्ली में रह रहे इन लोगों पर कब जायेगा? समाज सुधार का प्रण लेकर काम करने वाले एनजीओ का ध्यान इस तरफ कब जायेगा? कब और कैसे यह लोग नशे के इस चंगुल से बाहर निकलेंगे

Saturday, 27 August 2016

दर दर भटकते शनिदेव

  शनि एक ऐसा नाम जिसे सुनने मात्र से एक ऐसी छवी आखों के सामने आती है जिसका शरीर काले रंग का है। आंखें बडी खुली हुई, भौं चढी हुई और क्रोध से भरे हुए है। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल हैं। यह तस्वीर तो शनि नाम सुनने मात्र से ही जहन में बन जाती है। क्या कोई भगवान इतना भयावह और गुस्से वाला हो सकता है क्या? अभी तक तो कुछ एक को छोड कर, भगवान के सारे चित्र मुर्तियां जो भी देखी सब में वह मंद मुस्कान के साथ ही होते है। पिछले महिने, एक शाम किर्ती नगर मैट्रो से निकलते ही कुछ ऐसा नजारा देखने को मिला कि हंसी रुक नहीं रही थी और साथ ही शनि को जानने की इच्छा बढ गयी। गूगल करने से ज्यादातर यहीं मिला कि शनि की साढे साती क्या है? शनि को कैसे खुश करे? आदि आदि....  इसी बीच एक वेबसाईट भी मिली शनिधामडोटइन, जिसमे कुछ नया पढने को मिला 'शनि शत्रु नहीं मित्र है'। फिर यूट्यूब पर दांती महाराज को भी ढूंढा। कुछ विडीयो मिले पर यह क्या?  यह समझ ही नही आ रहा की, यह समझा रहे है या डांट रहे है। खैर यह भी कर्म क्रिया की ही बात कर रहे थे। इतनी काली दाल की पोटली, तो किसी को अभिषेक और मंत्र जाप वगैरह वगैरह। फिर शनि चालीसा को अर्थ सहित पढा तो ज्यादातर में नकारात्मक छवि ही दिखी बस शुरुआती कुछ लाईन में कहा गया कि हे प्रभु आप जिस पर प्रसन्न हो जाते हो, तो दरिद्र को भी एक क्षण में राजा बना देते हैं। लेकिन इस के बाद कई ऐसे प्रसंग बताए जिसमें सिर्फ शनि की वजह से ही काम खराब हुये हो। जैसे आपने कैकेयी द्वारा श्रीराम को वन में भेज दिया, बाद में सीता अपहरण करवा दिया। आगे राजा विक्रमादित्य को आपने ही तेली के घर में कोल्हू चलाने के लिए मजबूर करवा दिया। राजा हरिशचंद्र, कौरवों पर आपकी दृश्टि आदि आदि अनेक प्रसंग है कि किस प्रकार आप नाश के कारक बने। कुल मिला कर शनि कि ऐसी छवी निकल कर सामने आती है कि जिस पर शनि की दृश्टि पडी वो तबाह हो गया। अब ऊपाय यह है कि पंडित द्वारा जप-तप, पूजा-पाठ करा कर शनि का प्रकोप कम करवा सकते हो। फिर याद आया कि सोसाइटी में घर-घऱ मांगने वाले बाबा या भिखारी को कई लोग मना कर देते थे लेकिन शनिवार को एक छोटी बाल्टी में लोहे कि टीन के सांकेतिक शनि महाराज बने रहते है और हर घर से उसे तेल या पैसे मिलते ही है। लेकिन आज कल लगता है धर्म के नाम पर बिजनेस करने वालो को यह बात बखूबी समझ आ गयी है कि आज के भाग-दौड भरी जिंदगी में कई लोग ऐसे भी है जो चाह कर भी समय के अभाव के कारण मंदिर नहीं आ पाते। और उनकी जेब से पैसे निकलवाने के लिए इन ठेकेदारो ने भगवानो को ही भक्तो के पास दर दर भटकते पहुंचा दिया। तभी तो आज एक बक्से के साथ लोहे के टिन की शनि की प्रतिमा जिसमें एक सिर और ऊपर की ओर दो हाथ, सामने एक दिया और एक माला के साथ हर रेड लाईट, मैट्रो स्टेशन के बाहर, चौकचौराहे, फुटपाथ और शौचालय के बगल में भी शनिदेव मौजूद रहते है। 
अपनी कांख में शनिदेेव को दबाये बच्चा
पिछले माह किर्ती नगर मैट्रो के बाहर देखा के 4-5 बच्चे इस शनिदेव का बक्सा खोल तेल और पैसे अलग कर, साइड में थैला डाल, एक ने उस शनि की प्रतिमा अपने बगल में दबा कर, बक्सा सिर पर उठा कर चल दिये। मैं यह देखकर खूब हंस रहा था कि जिस शनि से सबको इतना डराया गया और लोग डर भी रहे है उसी शनि को यह बच्चे अपनी कांख में दबाकर बिना किसी फिक्र के चले जा रहे है।
बक्सा उठा कर ले जाते बच्चे
इन बच्चो का मै शुक्रगुजार हूं कि इन के कारण मैने शनि के बारे में पढा। और एक बात दोस्तो शनि के बारे पढते हुए एक बात और सामने आयी कि हिन्दू धर्म गुरुओ में इस बात का भी विवाद है कि शनि ग्रह है या भगवान ?




Thursday, 18 August 2016

आपकी साथी भी किसी कि बहन है, उसी तरह जिस तरह आपकी बहन किसी कि साथी है।




             आज रक्षाबंधन का त्यौहार है। हम सभी बचपन से इसे मनाते आ रहे है। इसके बारे में पढते आ रहे है। खासकर पेपर के समय में तो जरुर ही रट्टे मारते थे कि रक्षाबंधन हिंदुओ का पवित्र त्योहार है यह सावन मास कि पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन भाई बहन सुबह सुबह सुबह नहा धोकर नये कपडे पहन कर तैयार होते है आदि आदि करीब एक दो पेज तो हम सबने रटा ही होगा। लेकिन क्या हम इसका महत्व सच में समझते है। अगर हां तो क्यो हम अपनी बहन और पडोस में रहने वाली, सहपाठी, सहकर्मी में अंतर कर देते है। खैंर अंतर करना भी ठीक है लेकिन इतना बढा अंतर कहा तक ठीक है साहब। खुद तो छुट्टी के दिन घुमने के लिए आप अपनी साथी को बुलाते है और हरसंभव प्रयास करते है कि वह आये लेकिन घर में बहन बोले कि आज दोस्तों के साथ बाहर घुमने जाना है तो लग जाते है  सवालों की झडी लगाने। अपनी बहन की सुरक्षा की चिंता करना कि कही उसके साथ कुछ गल्त न हो जाये? कैसे दोस्त होंगे?  जमाना बहुत खराब है । इस जमाने को खराब किसने किया है । जाहिर है आपने और मैने, जिसे हम कभी कभी असमाजिक तत्व भी कह देते है। राजनेता हमेशा भाईयो बहनो कर के संबोधित करते है लेकिन क्या सच में वह सबको वही दर्जा देता है जो अपनी बहन को देता है। अगर हां तो क्यों मां बहन कि गालियां इनके मुंह पर ही रहती है। क्यों कभी कभी यह किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार कर देते है जो शायद अपनी  बहन के बारे में गल्ती से भी कल्पना नहीं कर सकते। पुलिस जो हमारी रक्षा के लिए मुस्तैद रहती है आज के दिन कई संगठनों की महिलाएं उन्हें राखी बांधती है और नारीयों की रक्षा का वचन लेती है तो क्यों बलात्कार, अपहरण जैसी घटनाओं के बाद भी कुछ पुलिस वाले एफआईआर करने से कतराते है। या अजिबो गरिब सवाल पूछ कर पीडिता को असहज करते है। हमने प्राचीन काल के अनुसार गुरुओ, ब्राह्मणो द्वारा रक्षा सूत्र बंधवाने का प्रसंग भी सुना है। तो आज ये ही कुछ तथाकथित बाबा क्यों अपनी बहन बेटियो की उम्र की लडकियों के साथ भोग विलास में लिप्त है। आखिर परेशानी कहा है? क्यो समाज में महिलाओ के साथ बलात्कार, अपहरण, शोषण आदि इतना बढ रहा है?  मेरी समझ में शायद हम अपने और पराये में अंतर कर देते है। अगर हम अपनी महिला साथियों के साथ ऐसा कुछ दुर्व्यवहार करें ही नहीं जिसे अपनी बहन के साथ होता न देख सकें। और जिस प्यार स्नेह कि अपेक्षा हम अपनी महिला साथीयों से करते है, वहीं हक अपनी बहन को भी उसके साथीयों के लिए दें तो समस्या कि जड ही खत्म क्योकि आपकी साथी भी किसी कि बहन है उसी तरह, जिस तरह आपकी  बहन किसी कि साथी है। एक समारोह में दामिनी की मां ने बहुतखूब कहा कि कभी किसी भी लडकी के साथ कुछ भी करने से पहले यह सोचना कि अगर यह तुम्हारी बहन के साथ होता तो तुम क्या करते। यकिनन यह ऐसी लाईन है जिसे अगर हम गांठ मार ले तो शायद बलात्कार, अपहरण, शोषण जैसी घटनाएं बिल्कुल बंद हो जाए। तो आइए आज रक्षाबंधन के दिन अपनी बहन कि रक्षा के साथ साथ सभी महिलाओ की रक्षा करे, उनका सम्मन करें। उन्हे पढाये लिखाये आगे बढायें।