Tuesday, 5 April 2016

पत्रकारिता या दलदल


       पत्रकारिता का क्षेत्र दूर से जितना आकर्षक लगता है, उसकी हकीकत उतनी ही बेकार है। शिफ्टों में काम करना, फील्ड की भागदौड़, बेहतर करने का तनाव पत्रकारों के शारीरिक के साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहा है। इन सब से इत्तर पत्रकार बनने की चाह रखने वाले आज के युवा वर्ग का जिस कदर शोषण किया जा रहा है वह किसी से छुपा नहीं है।
अनिश्चित दिनचर्या और खाने-पीने का कोई सही समय न हो पाने की वजह से पत्रकारों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जिस नाम-शौरहत पाने की ललक और समाज की बुराईओं को देश-दुनिया के सामने लाने के लिए इस दलदल में कदम रखता है वह बस इसमें गिरता ही चला जाता है। तभी तो राष्ट्रीय चैनलों में भी क्या शिफ्ट और क्या टाइम, बॉस के सामने खुद को साबित करने के लिए दिन रात काम करते रहते है। और यही बात बार बार अपने से निम्न पद पर बैठे व्यक्ति से बताते है परिणाम स्वरुप वह भी इसे ही अपना धर्म समझता है और खुद को साबित करने करने के लिए रात दिन एक कर देता है। लेकिन बाद में होता क्या है जरुरत न होने पर संस्थान द्वारा एक नोटिस दे कर दूसरे ही क्षण कर्मचारी को बाहर की रास्ता दिखा दिया जाता है। इंटर्न के नाम पर तो छात्रों से कम से कम 6 महिने मुफ्त में काम सिखाने के बहाने उसका शोषण किया जाता है और बाद में नौकरी के नाम पर सिर्फ दिलासा ही दी जाती है कि बहुत जल्द तुम्हे बुलायेंगे और इस इंतजार में रहता है की कब फोन आये। कुछ हिम्मत करके दुसरे संस्थान में जाता है तो वहां भी यहीं प्रक्रिया अधिकांश छात्र कुछ समय तक संघर्ष करते है और फिर बाद में कोई गल्त कदम उठाने पर मजबूर है जाते है। खबरों की दुनिया में मुख्यधारा की पत्रकारिता की अपनी अलग चुनौतियां तो हैं ही, ग्रामीण इलाकों में भी चुनौतियां कुछ कम नहीं हैं। संसाधनों की कमी से जूझते ग्रामीण पत्रकार की चुनौतियों में से सबसे बड़ी चुनौती अनियमित तनख्वाह है। कई बार तो इन पत्रकारों को दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। इसलिए गांवों में जो भी लोग पत्रकारिता से जुड़े हैं वे कोशिश करते हैं कि उनके पास आय के दूसरे स्रोत भी हों ताकि परिवार का खर्च चलाने में मुश्किलें न आएं। तभी देश के नामी पत्रकारों में से एक रविश कुमार को अपने ब्लॉग में लिखना पडता है कभी रविश कुमार मत बनना। या पत्रकारिता की पढाई कर रहे छात्रों को क्लास में या क्लास के बाहर प्रोफेसरों द्वारा आसानी से यह कहते हुए देखा जाता है कि बेटा किसी और पेशे की ओर भी ध्यान दो मगर छात्र को तो जिद्द होती है कि वह पत्रकारिता ही करेगा और अपनी काबिलियत को सिद्ध करते हुये इस दुनिया को सच्चाई की राह पर ले जायेगा। वह जी-जान लगा कर अपने मालिक को खुश करने के लिए खुब मेहनत करता है। साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ दाव पर लगा कर अपने साथी कर्मचारी से आगे निकलने के लिए हर संभव प्रयास करता है और कब इस दलदल में फसता है यह उसे समझ ही नहीं आता और अगर समझ आता भी है तो तबतक बहुत देर हो चुकी होती है। कुल मिला कर यह एक ऐसा दलदल है जो एक बार इसमें आया बस इसी में फसता चला गया।