Saturday, 5 December 2015

भारतरत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर

भारतीय संविधान के निर्माता भारतरत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर उन युग पुरुषों में से थे जो दूर का सपना देखते थे। इसी का नतीजा है कि उन्होनें एक ऐसे संविधान का गठन किया जो देश के हर व्यक्ति को समान अधिकार और दायित्व देती है। लेकिन हाल ही  में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के संविधान संशोधन द्वारा आरक्षण हटाने कि बात कहे जाने पर कैसे सरकार को चारों तरफ से घेरा गया, और उसका खामियाजा किस तरह भाजपा को बिहार चुनाव हार कर  चुकाना पडा यह किसी से छुपा नहीं है। दरसल डॉ अम्बेडकर भारत में ऐसा समाज चाहते थे जिसमें जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद तथा ऊंच-नीच का भेद न हो और प्रत्येक मनुष्य अपनी योग्यता के अनुसार सामाजिक दायित्वों को पूरा करते हुए स्वाभिमान और सम्मानपूर्ण जीवन जी सके।

 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक महार जाति के रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई के घर उनकी 14वीं संतान के रुप में अम्बेडकर ने जन्म लिया। अम्बेडकर के व्यक्तित्व पर उनके पिता का गहरा प्रभाव था। लेकिन वहीं विद्यालय के वातावरण का अम्बेडकर के व्यक्तित्व पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अपने सवर्ण सहपाठियों के जातिगत र्दुव्‍यवहार से अम्बेडकर का मन
बहुत आहत हुआ और यही भेदभाव उनके सामाजिक चिन्तन की पीड़ा बनकर उभरा।1907 में मैट्रिक पास करने और कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य भारतीय बने। इतना ही नहीं अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र जैसे कठिन विषयों की शिक्षा-दीक्षा ब्रिटेन तथा अमेरिका के विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 1916 में अम्बेडकर को उनके शोधकार्य हेतु पी-एचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया।

अम्बेडकर ने दलित समाज को त्रिसूत्री आचार संहिता प्रदान की जिसके तीन सूत्र हैं - शिक्षित बनो, संगठित होओ तथा संघर्ष करो। बाबा साहेब के इस मार्गदर्शन से दलित आन्दोलन भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन बन गया है। इसके परिणाम स्वरूप समाज के दबे-कुचले लोगों को संजीवनी मिली है। संक्षेप में कहे तो 31 जनवरी 1920 को बाबा साहेब ने मूकनायक पाक्षिक निकाला,1927 में महाड की चावदार झील से दलितों को पानी पीने का हक दिलाने के लिए आंदोलन चलाया और उसी साल उन्होंने ‘मनुस्मृति’ जलाई। उन्होंने 1930 में नाशिक के कलाराम मंदिर में अछूतों के प्रवेश के लिए तकरीबन डेढ़ लाख लोगों के साथ मार्च किया, लेकिन पुजारियों ने मंदिर के पट बंद कर दिए। उसके बाद विचार और कर्म के स्तर पर और संवैधानिक स्तर पर आरक्षण से लेकर उन्होंने सामाजिक न्याय के तमाम प्रयास किए और संविधान में आर्थिक लोकतंत्र की भी व्यवस्था नीति निर्देशक तत्त्वों के माध्यम से की। उन्होने श्रमिको की
दशा सुधारने के प्रयास किये, गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए। 1936 में उन्होने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन कर राजनीति में अपने कदम बढा दिये। बाद में फरवरी 1937 में प्रांतीय विधायिका सदन में उनकी पार्टी के 17 सदस्य चुने गये। 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने अंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया और 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अम्बेडकर ने समाज के उपेक्षित, कमजोर तथा सदियों से सामाजिक शोषण से ग्रस्त दलित वर्ग को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य ही नहीं किया बल्कि एक समाज सुधारक की हैसियत से भी दलित वर्ग को भारतीय संविधान में समानता के कानूनी अधिकार प्रदान किए। राजनीति में आने का मकसद दलितों को उनका हक दिलाने के लिए हरसंभव प्रयास करना जिसे उन्होने किया भी। जिस तरह भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह से देश को ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त कराया, तो दूसरी ओर अम्बेडकर ने हजारों वर्षो से उत्पीड़ित दलित वर्ग को स्वाभिमान से जीने का रास्ता दिखाया। आजादी के 68 साल बाद भी भारत में दलितों की स्थिति में वह बदलाव नहीं आया जो आना चाहिए था। अम्बेडकर ने यू हीं नहीं भरी सभा में कहा था याद रखो तुम्हारे प्रति जो सवर्णों का आकर्षण है वो प्रेम नहीं बल्कि तुम्हारे खो जाने का भय है।अम्बेडकर भलीभांति जानते थे
कि दलितों का किस तरह सवर्णो द्वारा वोट बैंक के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए अम्बेडकर ने संविधान में सबको समान वोट देने का अधिकार दिया। इसी का नतिजा चुनावों के दौरान आत्म गौरव की बात जोर शोर से की जाती है और चुनाव के बाद वहीं आत्मगौरव दफना दिया जाता है। लोहिया,जयप्रकाश नारायण जैसे राजनीतिक तथा सामाजिक चिंतक भी हुए है जिन्होने पिछडो के लिए काम किया। तो अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दिनों में रामविलास पासवान और मायावती जैसे नेता दलितो की हक की लडाई के लिए सदैव अग्रीम पंक्ति के नेता रहे। परंतु जैसे जैसे राजनीति में उनका दबदबा बढता गया वैसे वैसे उनका समाज के प्रति अस्तित्व घटता गया। जब सत्ता सुविधा और समझौते का रंग राजनीतिज्ञों पर पडने लगा तो आत्मगौरव की बात पीछे छूट गई। केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने के उद्द्श्य से दलित और दूसरी अन्य पिछडी जातियों को केवल चुनाव दौरान ही याद किया जाता है। जवाब में उग्र हिंदुवाद से बचने के लिए सुरक्षा की तळाश में जिसने झासा दिया उसी को वोट दे दिया। इसका नतिजा यह हुआ कि जमीनीं स्तर पर दलितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। यह देखने के लिए आपको ग्रामीण इलाको की ओर जाना पडेगा जहां आज भी दलितों के साथ बडी संख्या में दुर्व्यवहार किया जाता है।

अपने जीवन काल में बाबा साहब हिंदू वर्ण व्यवस्था से इस कदर परेशान हुए कि आखिरकार उन्होने हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाने का मन बना लिया। 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में अंबेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। अंबेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। लम्बे समय से अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित थे और 6 दिसंबर 1956 को दलितों को उनके हक का पाढ पढाने वाले अम्बेडकर की मृत्यु हो गई ।और जाते जाते दलितों और पिछडों को एक ब्रम्हास्त देते गये अब जरुरत है इसकी ताकत पहचानने की। भारतीय संविधान ही सब वर्गो के लोगो की आर्थिक और सामाजिक बराबरी सुनिश्चित करता है। संविधान बाबा साहेब के चितंन का एक जीवंत दस्तावेज है, जो कि भारत जैसे देश को स्थायी रूप से संभाल सकता है।

Wednesday, 2 December 2015

तमाशा

एक फिल्म जिसमे हसी-मजाक के साथ साथ एक दर्द को दिखाया गया है। जिससे हर कोई कभी न कभी गुजरता ही है। यह समय होता है जब प्रेमी एक-दूसरे को चाहते भी हैं और दुनिया को और खुद को ये जताना चाहते हैं कि प्यार नहीं भी है। अभिनय के दौरान दीपिका और रणबीर ने शत प्रतिशत अंजाम दिया है. कुछ ऐसे सीन हैं जहां अल्फाज तो नहीं हैं लेकिन चेहरे के भाव देखकर ही हंसी आ जाती है तो कहीं भीतर का गम भी बाहर निकलता है।

एक बच्चा है वेद (रणबीर) उसकी दिलचस्पी कहानियां सुनने में है। बचपन से वो कहानियां सुनने के लिए पैसे भी चुराता हैयहीं पर बच्चें के दिमाग में बात डाली जाती है कि सारी कहानी एक सी ही होती है बस पात्र अलग। वह अपनी ही दुनिया में जीता है लेकिन जैसा कि फिल्मों में भी होता है और हकीकत में भी, पिता हकीकत में रहना वाला है तो वह बेटे से उम्मीद करता है कि वह पढ़ाई पर फोकस करे। कहानी आगे बढ़ती है और फिर वेद की फ्रांस में तारा (दीपिका)  से मुलाकात होती है। फिर दोनों का सफर शुरू हो जाता है। कुछ एहसास जगते हैं यहीं पर फिल्म का निर्देशक प्रवेश करता है और कहानी को ट्विस्ट देता है। दोनो एक दूसरे को चाहते तो हैं, लेकिन दिखावा ये करते हैं कि उनके बीच प्रेम नाम की किसी चिड़िया का अस्तित्व नहीं है। तो दोनों अपने देश वापस लौट जाते हैं। फिर चार साल बाद दोनों की मुलाकात होती है। फिर दोनों एक दूसरे को समझने लगते हैं। पर तारा ये महसूस करती है कि ये वो वेद नहीं है, जो कोर्सिका में मिला था। वो वेद को झिड़कती है औऱ कहती है कि वो बदल गया है और बोरिंग हो गया है। वह वेद को यह एहसास दिलाती है कि कॉरपोरेट जीवन में मैनेजर की भूमिका में वो अपनी जिंदगी का मकसद भूल गया है। लगभग ढाई घंटे की फिल्म में इम्तियाज सफर को खत्म ही नहीं होने देते कभी यह सफर जिंदगी का होता है तो कभी रिश्तों का। अच्छे नजारे जरूर देखने को मिलते हैं। फ्लैश बैक और हाल फिलहाल में चल रही कहानी में दोहराव कई जगह पर नजर आता है जिससे कहीं-कहीं बीच में अपनी पकड़ खोती नजर आती है।हालांकि फिल्म में युवा तेवर और युवाओं की मानसिकता के साथ कदमताल की कोशिश अच्छी है।कुल मिलाकर फिल्म के निर्देशन में वाकई में कुछ अलग और नया कर दिखाने पूरा प्रयास किया गया है।