पिछले
कुछ सालों से देश की राजधानी
दिल्ली में एक तबका ऐसा नज़र
आ रहा है जिसके सिर पर न छत है,
न
खाने को रोटी,
जैसे
तैसे पहनने को कपडे जरुर है।
ये तबका आपको सडक किनारे,
फ्लाईओवर
के नीचे,
मेट्रो
स्टेशन के बाहर या कुछ एक रैन
बसेरे में दिख जाएंगे। अपनी
जरुरत पूरी करने के लिए यह
चोरी लूट-पाट
के साथ साथ गुब्बारे या फूल
आदि जैसी चीजें बेचते नजर आ
जाएंगे। गंदे बदबूदार कपडे,
खुले
बाल,
मासूमियत
के साथ आते जाते लोगो के पैरो
में पडते हुए किसी तरह कुछ भी
करके बस दो,चार,
दस
रुपये निकलवाना ही इनका उद्देश्य
होता है। इन पैसों से यह अपनी
जरुरत कहे,
लत
कहे या मजबूरी का सामान लेते
है। और यही सामान इन्हे एक ऐसे
दलदल में ले के जा रहा है जिसका
अंदाजा खुद इन लोगो को भी नहीं
है।
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| सोलुसन सूंघते बच्चे |
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| मनोज अपनी दादी के साथ |
क्नॉट
प्लेस के हनुमान मंदिर के पास
लगभग 3
महीने
पहले मैंने कुछ बच्चों को आपस
में झगडते हुए देखा। उनमें
से एक को मैने इशारे से बुलाया।
उससे बात करने पर उसने अपना
नाम मनोज बताया। कहा महाराष्ट्र
का रहने वाला है यहां 5
साल
पहले आया है। मम्मी-पापा
नहीं है। दादी खादी ग्रामोद्धोग
के आगे भीख मांगती है। और में
भी गुब्बारे बेचता हूं। उसके
दोस्तों के बारे में पूछने
पर कहा कि ये सारे चरसी है। और
नशे में है इन्हें चोट नहीं
लगती। मैंने पूछा कि नशे के
लिए पैसे कहां से आते है,
उसने
कहा कि ऐसे ही गुब्बारे बेच
कर या भीख मांगकर। मनोज ने
बताया नशे के लिए भोला,
दवाईयां,
और
इंजेक्शन भी ले लेते है। जब
पैसे कम होते है तो सोलूसन
सूंघते है। सोलूसन 30
रुपये
का आता है और दिन भर चल भी जाता
है। इतने में ही वह अपने दोस्तों
के साथ भाग गया। पिछले रविवार
ऐसे ही गुज़र रहा था कि देखा
कि खादी
ग्रामोद्धोग के आगे एक लडका
लेटा है जिसके आंखें धसी हुई
है। पेट अंदर फेफडे दिख रहे
है। सूखे से हाथ-पैर
सगभग कंकाल जैसा शरीर। लेकिन
मन में शंका थी कि कहीं तो देखा
है इसे कौन है यह?
वापिस
आ के देखा तो याद आया ये तो मनोज
है और उसकी हालत ऐसी थी कि यकिन
करना मुश्किल है कि यह लडका
तीन महीने पहले
बिल्कुल ठीक रहा हो,
खेल-कूद
रहा हो। उसकी दादी से पूछना
चाहा पर वह कुछ जबाव ही नहीं
देती बस रोते हुए हाथ जोडे
पैसे मांगती रहती है। नशा एक
दीमक की तरह है जो शरीर को अंदर
ही अंदर खा जाती है यह कहना
कतई गल्त नहीं है। यह हाल सिर्फ
एक मनोज का नहीं है,
न
जाने कितने ही लोग इसके चपेट
में हैं।
पिछले
दिनों एक फिल्म ‘उडता पंजाब’
ने पंजाब में नशें की सारी पोल
खोल के रख दी। जिस पर वहां के
प्रशासन को चौतरफा घेरा गया
और आगामी चुनाव में वह राजनैतिक
पार्टियों के लिए चुनावी
मुद्दा भी बन गया। लेकिन अब
देखना है कि दिल्ली में जहां
सांसद,
विधायक
और मंत्री जो खुद को जनता का
सेवक बता कर यहां तक आते हैं।
उनका ध्यान इन लोगों पर कब
जाएगा?
पूर्ण
बहुमत के साथ दिल्ली में आयी
‘आम आदमी पार्टी’ जो पंजाब
में नशे को चुनावी मुद्दा बना
रही है। उसका ध्यान दिल्ली
में रह रहे इन लोगों पर कब
जायेगा?
समाज
सुधार का प्रण लेकर काम करने
वाले एनजीओ का ध्यान इस तरफ
कब जायेगा?
कब
और कैसे यह लोग नशे के इस चंगुल
से बाहर निकलेंगे?



