Friday, 23 September 2016

नशा, जुगाड और दिल्ली



पिछले कुछ सालों से देश की राजधानी दिल्ली में एक तबका ऐसा नज़र आ रहा है जिसके सिर पर न छत है, न खाने को रोटी, जैसे तैसे पहनने को कपडे जरुर है। ये तबका आपको सडक किनारे, फ्लाईओवर के नीचे, मेट्रो स्टेशन के बाहर या कुछ एक रैन बसेरे में दिख जाएंगे। अपनी जरुरत पूरी करने के लिए यह चोरी लूट-पाट के साथ साथ गुब्बारे या फूल आदि जैसी चीजें बेचते नजर आ जाएंगे। गंदे बदबूदार कपडे, खुले बाल, मासूमियत के साथ आते जाते लोगो के पैरो में पडते हुए किसी तरह कुछ भी करके बस दो,चार, दस रुपये निकलवाना ही इनका उद्देश्य होता है। इन पैसों से यह अपनी जरुरत कहे, लत कहे या मजबूरी का सामान लेते है। और यही सामान इन्हे एक ऐसे दलदल में ले के जा रहा है जिसका अंदाजा खुद इन लोगो को भी नहीं है।  

सोलुसन सूंघते बच्चे
आज कल नशा एक फैशन बनता जा रहा है जिसे हर वर्ग के लोग अपनी शान समझ के करते है। चाहे वो अमीर हो या गरीब। असल दिक्कत तो इन लोगों के लिए ही है। जिनके पास पैसे तो नहीं हैं लेकिन यह 3-4 साल के बच्चों से ले कर युवा लोग इस कदर नशे का शिकार हो गये है  कि वह अपनी इस जरुरत के लिए कुछ भी कर सकते है। इन्हे नशे के लिए शराब औ्रर हेरोइन जैसे मादकपदार्थ की जरुरत नही होती बल्कि ये कुछ अलग चीजों से ही अपनी तलब दूर करते है जैसे फ्लूड, थीनर, सोलूसन(पेंचर लगाने का केमिकल) इन ची़जों को कपडे के टुकडे में डाल कर मुंह से सांस अंदर की लेते है। और कुछ मिनट के अंदर ही यह बेसुध हो जाते है। अगर आप इन्हे देखना चाहते है तो आपको थोडा जागरुक होने की जरुरत है। यह आपको दिल्ली के किसी भी कोने में बडे ही आसानी के साथ दिख जाऐंगे। चाहे वह क्नॉट प्लेस हो या चांदनी चौक, रेलवे स्टेशन हो या मैट्रो स्टेशन। 

मनोज अपनी दादी के साथ
क्नॉट प्लेस के हनुमान मंदिर के पास लगभग 3 महीने पहले मैंने कुछ बच्चों को आपस में झगडते हुए देखा। उनमें से एक को मैने इशारे से बुलाया।  उससे बात करने पर उसने अपना नाम मनोज बताया। कहा महाराष्ट्र का रहने वाला है यहां 5 साल पहले आया है। मम्मी-पापा नहीं है। दादी खादी ग्रामोद्धोग के आगे भीख मांगती है। और में भी गुब्बारे बेचता हूं। उसके दोस्तों के बारे में पूछने पर कहा कि ये सारे चरसी है। और नशे में है इन्हें चोट नहीं लगती। मैंने पूछा कि नशे के लिए पैसे कहां से आते है, उसने कहा कि ऐसे ही गुब्बारे बेच कर या भीख मांगकर। मनोज ने बताया नशे के लिए भोला, दवाईयां, और इंजेक्शन भी ले लेते है। जब पैसे कम होते है तो सोलूसन सूंघते है। सोलूसन 30 रुपये का आता है और दिन भर चल भी जाता है। इतने में ही वह अपने दोस्तों के साथ भाग गया। पिछले रविवार ऐसे ही गुज़र रहा था कि देखा कि खादी ग्रामोद्धोग के आगे एक लडका लेटा है जिसके आंखें धसी हुई है। पेट अंदर फेफडे दिख रहे है। सूखे से हाथ-पैर सगभग कंकाल जैसा शरीर। लेकिन मन में शंका थी कि कहीं तो देखा है इसे कौन है यह? वापिस आ के देखा तो याद आया ये तो मनोज है और उसकी हालत ऐसी थी कि यकिन करना मुश्किल है कि यह लडका तीन महीने  पहले बिल्कुल ठीक रहा हो, खेल-कूद रहा हो। उसकी दादी से पूछना चाहा पर वह कुछ जबाव ही नहीं देती बस रोते हुए हाथ जोडे पैसे मांगती रहती है। नशा एक दीमक की तरह है जो शरीर को अंदर ही अंदर खा जाती है यह कहना कतई गल्त नहीं है। यह हाल सिर्फ एक मनोज का नहीं है, न जाने कितने ही लोग इसके चपेट में हैं।


पिछले दिनों एक फिल्म ‘उडता पंजाब’ ने पंजाब में नशें की सारी पोल खोल के रख दी। जिस पर वहां के प्रशासन को चौतरफा घेरा गया और आगामी चुनाव में वह राजनैतिक पार्टियों के लिए चुनावी मुद्दा भी बन गया। लेकिन अब देखना है कि दिल्ली में जहां सांसद, विधायक और मंत्री जो खुद को जनता का सेवक बता कर यहां तक आते हैं। उनका ध्यान इन लोगों पर कब जाएगा? पूर्ण बहुमत के साथ दिल्ली में आयी ‘आम आदमी पार्टी’ जो पंजाब में नशे को चुनावी मुद्दा बना रही है। उसका ध्यान दिल्ली में रह रहे इन लोगों पर कब जायेगा? समाज सुधार का प्रण लेकर काम करने वाले एनजीओ का ध्यान इस तरफ कब जायेगा? कब और कैसे यह लोग नशे के इस चंगुल से बाहर निकलेंगे

Saturday, 27 August 2016

दर दर भटकते शनिदेव

  शनि एक ऐसा नाम जिसे सुनने मात्र से एक ऐसी छवी आखों के सामने आती है जिसका शरीर काले रंग का है। आंखें बडी खुली हुई, भौं चढी हुई और क्रोध से भरे हुए है। इनके हाथों में धनुष, बाण, त्रिशूल हैं। यह तस्वीर तो शनि नाम सुनने मात्र से ही जहन में बन जाती है। क्या कोई भगवान इतना भयावह और गुस्से वाला हो सकता है क्या? अभी तक तो कुछ एक को छोड कर, भगवान के सारे चित्र मुर्तियां जो भी देखी सब में वह मंद मुस्कान के साथ ही होते है। पिछले महिने, एक शाम किर्ती नगर मैट्रो से निकलते ही कुछ ऐसा नजारा देखने को मिला कि हंसी रुक नहीं रही थी और साथ ही शनि को जानने की इच्छा बढ गयी। गूगल करने से ज्यादातर यहीं मिला कि शनि की साढे साती क्या है? शनि को कैसे खुश करे? आदि आदि....  इसी बीच एक वेबसाईट भी मिली शनिधामडोटइन, जिसमे कुछ नया पढने को मिला 'शनि शत्रु नहीं मित्र है'। फिर यूट्यूब पर दांती महाराज को भी ढूंढा। कुछ विडीयो मिले पर यह क्या?  यह समझ ही नही आ रहा की, यह समझा रहे है या डांट रहे है। खैर यह भी कर्म क्रिया की ही बात कर रहे थे। इतनी काली दाल की पोटली, तो किसी को अभिषेक और मंत्र जाप वगैरह वगैरह। फिर शनि चालीसा को अर्थ सहित पढा तो ज्यादातर में नकारात्मक छवि ही दिखी बस शुरुआती कुछ लाईन में कहा गया कि हे प्रभु आप जिस पर प्रसन्न हो जाते हो, तो दरिद्र को भी एक क्षण में राजा बना देते हैं। लेकिन इस के बाद कई ऐसे प्रसंग बताए जिसमें सिर्फ शनि की वजह से ही काम खराब हुये हो। जैसे आपने कैकेयी द्वारा श्रीराम को वन में भेज दिया, बाद में सीता अपहरण करवा दिया। आगे राजा विक्रमादित्य को आपने ही तेली के घर में कोल्हू चलाने के लिए मजबूर करवा दिया। राजा हरिशचंद्र, कौरवों पर आपकी दृश्टि आदि आदि अनेक प्रसंग है कि किस प्रकार आप नाश के कारक बने। कुल मिला कर शनि कि ऐसी छवी निकल कर सामने आती है कि जिस पर शनि की दृश्टि पडी वो तबाह हो गया। अब ऊपाय यह है कि पंडित द्वारा जप-तप, पूजा-पाठ करा कर शनि का प्रकोप कम करवा सकते हो। फिर याद आया कि सोसाइटी में घर-घऱ मांगने वाले बाबा या भिखारी को कई लोग मना कर देते थे लेकिन शनिवार को एक छोटी बाल्टी में लोहे कि टीन के सांकेतिक शनि महाराज बने रहते है और हर घर से उसे तेल या पैसे मिलते ही है। लेकिन आज कल लगता है धर्म के नाम पर बिजनेस करने वालो को यह बात बखूबी समझ आ गयी है कि आज के भाग-दौड भरी जिंदगी में कई लोग ऐसे भी है जो चाह कर भी समय के अभाव के कारण मंदिर नहीं आ पाते। और उनकी जेब से पैसे निकलवाने के लिए इन ठेकेदारो ने भगवानो को ही भक्तो के पास दर दर भटकते पहुंचा दिया। तभी तो आज एक बक्से के साथ लोहे के टिन की शनि की प्रतिमा जिसमें एक सिर और ऊपर की ओर दो हाथ, सामने एक दिया और एक माला के साथ हर रेड लाईट, मैट्रो स्टेशन के बाहर, चौकचौराहे, फुटपाथ और शौचालय के बगल में भी शनिदेव मौजूद रहते है। 
अपनी कांख में शनिदेेव को दबाये बच्चा
पिछले माह किर्ती नगर मैट्रो के बाहर देखा के 4-5 बच्चे इस शनिदेव का बक्सा खोल तेल और पैसे अलग कर, साइड में थैला डाल, एक ने उस शनि की प्रतिमा अपने बगल में दबा कर, बक्सा सिर पर उठा कर चल दिये। मैं यह देखकर खूब हंस रहा था कि जिस शनि से सबको इतना डराया गया और लोग डर भी रहे है उसी शनि को यह बच्चे अपनी कांख में दबाकर बिना किसी फिक्र के चले जा रहे है।
बक्सा उठा कर ले जाते बच्चे
इन बच्चो का मै शुक्रगुजार हूं कि इन के कारण मैने शनि के बारे में पढा। और एक बात दोस्तो शनि के बारे पढते हुए एक बात और सामने आयी कि हिन्दू धर्म गुरुओ में इस बात का भी विवाद है कि शनि ग्रह है या भगवान ?




Thursday, 18 August 2016

आपकी साथी भी किसी कि बहन है, उसी तरह जिस तरह आपकी बहन किसी कि साथी है।




             आज रक्षाबंधन का त्यौहार है। हम सभी बचपन से इसे मनाते आ रहे है। इसके बारे में पढते आ रहे है। खासकर पेपर के समय में तो जरुर ही रट्टे मारते थे कि रक्षाबंधन हिंदुओ का पवित्र त्योहार है यह सावन मास कि पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन भाई बहन सुबह सुबह सुबह नहा धोकर नये कपडे पहन कर तैयार होते है आदि आदि करीब एक दो पेज तो हम सबने रटा ही होगा। लेकिन क्या हम इसका महत्व सच में समझते है। अगर हां तो क्यो हम अपनी बहन और पडोस में रहने वाली, सहपाठी, सहकर्मी में अंतर कर देते है। खैंर अंतर करना भी ठीक है लेकिन इतना बढा अंतर कहा तक ठीक है साहब। खुद तो छुट्टी के दिन घुमने के लिए आप अपनी साथी को बुलाते है और हरसंभव प्रयास करते है कि वह आये लेकिन घर में बहन बोले कि आज दोस्तों के साथ बाहर घुमने जाना है तो लग जाते है  सवालों की झडी लगाने। अपनी बहन की सुरक्षा की चिंता करना कि कही उसके साथ कुछ गल्त न हो जाये? कैसे दोस्त होंगे?  जमाना बहुत खराब है । इस जमाने को खराब किसने किया है । जाहिर है आपने और मैने, जिसे हम कभी कभी असमाजिक तत्व भी कह देते है। राजनेता हमेशा भाईयो बहनो कर के संबोधित करते है लेकिन क्या सच में वह सबको वही दर्जा देता है जो अपनी बहन को देता है। अगर हां तो क्यों मां बहन कि गालियां इनके मुंह पर ही रहती है। क्यों कभी कभी यह किसी महिला के साथ अभद्र व्यवहार कर देते है जो शायद अपनी  बहन के बारे में गल्ती से भी कल्पना नहीं कर सकते। पुलिस जो हमारी रक्षा के लिए मुस्तैद रहती है आज के दिन कई संगठनों की महिलाएं उन्हें राखी बांधती है और नारीयों की रक्षा का वचन लेती है तो क्यों बलात्कार, अपहरण जैसी घटनाओं के बाद भी कुछ पुलिस वाले एफआईआर करने से कतराते है। या अजिबो गरिब सवाल पूछ कर पीडिता को असहज करते है। हमने प्राचीन काल के अनुसार गुरुओ, ब्राह्मणो द्वारा रक्षा सूत्र बंधवाने का प्रसंग भी सुना है। तो आज ये ही कुछ तथाकथित बाबा क्यों अपनी बहन बेटियो की उम्र की लडकियों के साथ भोग विलास में लिप्त है। आखिर परेशानी कहा है? क्यो समाज में महिलाओ के साथ बलात्कार, अपहरण, शोषण आदि इतना बढ रहा है?  मेरी समझ में शायद हम अपने और पराये में अंतर कर देते है। अगर हम अपनी महिला साथियों के साथ ऐसा कुछ दुर्व्यवहार करें ही नहीं जिसे अपनी बहन के साथ होता न देख सकें। और जिस प्यार स्नेह कि अपेक्षा हम अपनी महिला साथीयों से करते है, वहीं हक अपनी बहन को भी उसके साथीयों के लिए दें तो समस्या कि जड ही खत्म क्योकि आपकी साथी भी किसी कि बहन है उसी तरह, जिस तरह आपकी  बहन किसी कि साथी है। एक समारोह में दामिनी की मां ने बहुतखूब कहा कि कभी किसी भी लडकी के साथ कुछ भी करने से पहले यह सोचना कि अगर यह तुम्हारी बहन के साथ होता तो तुम क्या करते। यकिनन यह ऐसी लाईन है जिसे अगर हम गांठ मार ले तो शायद बलात्कार, अपहरण, शोषण जैसी घटनाएं बिल्कुल बंद हो जाए। तो आइए आज रक्षाबंधन के दिन अपनी बहन कि रक्षा के साथ साथ सभी महिलाओ की रक्षा करे, उनका सम्मन करें। उन्हे पढाये लिखाये आगे बढायें। 

Wednesday, 20 July 2016

कॉलेज माने सिर्फ मस्ती नहीं

      स्कूल लाईफ खत्म अब तो मस्ती के दिन है यारो। जैसे तैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन हो ही गया। दिल्ली युनिवर्सिटी के किसी भी कॉलेज में एडमिशन हो गया तो मानो तीन साल की तो मौज है। कॉलेज चाहे कोई भी हो मगर कुछ चीजें सारे कॉलेज एक जैसी होती है। जैसे पहले ही दिन कन्वोकेशन प्रोग्राम जिसमें आधे से ज्यादा टाईम तो यही ढूंढने में लग जायेगा कि ऑडिटोरियम कहां है। ऑडी में यहां आपके आस पास में जो भी बंदे होंगे वो आपके कोर्स के नहीं होंगे। इनमें से एक आपका दोस्त बन जायेगा और बाद में इसके मिलने पर हमेशा यह तुम्हे अपने दोस्तो को बताना पडेगा कि कौन है यह। कॉलेज में कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो पहले ही दिन से इस केल्कुलेशन में जुट जायेंगे कि कॉलेज में कितनी लडकिया है और किसे पटाया जाये, क्योकि इनका मानना होता है कि शुरु के दो तीन दिन में अगर कोई पट गयी तो पट गयी वर्ना ठनठन गोपाल। एक जमात ऐसी मिलेगी जो हिन्दी मीडियम वालो को ऐसे हीन नजर से देखेगी कि मानो एलिजाबेथ कि पोते-पोती यही है। यह अकसर कॉलेज के बाहर खोके पर सुट्टे मारते, पब-डिस्क, और दो ब्रांड में कम्पैरिजन करते नजर आयेंगे बेशक खुद कमला नगर औऱ पालिका के कपडे पहनते हो। हर डिपार्टमेंट में एक लडका तो ऐसा होगा ही जो शुरुआती दिनों में गिटार लाता हो। गुलाबी आंखे जो तेरी देखी यह इनका फेवरेट सॉंग होता है। कॉलेज में ऐसे बंदे भी मिलेंगे जो ज्ञान की उल्टियां करते रहते हो। यह दिन के चौब्बीस घंटे में से पच्चीस घंटे पढते है। इन्हें मार्केट में बुक लॉंच होने के कुछ ही घंटो के बाद वो बुक इनके पास होने का खिताब होता है। एक पलटन ऐसी होगी जो सिर्फ कॉलेज के गेट के बाहर और कॉलेज के कैंटीन में ही मिलेगी। इनकी फेवरेट लाईन होती है ‘बेलेट नम्बर .. प्लीज वोट फॉर ...’ शुरुआती दिनो में यह बहुत व्यस्त रहते है। कब कहा धऱना देना है इन्हे बखूबी पता होता है। ढपली, स्लोगन और मंच आदि की व्यवस्था करने में यह माहिर होते है। कुछ ऐसे भी महापुरुष मिलेंगे जिन्हें देख लगेगा कि इन्होने जीवन की सच्चाई को जान लिया है। कौन क्या सोचता है इन्हे इस बात से कोई फर्क नहीं पडता। बडी दाढी, बडे बाल के साथ कुर्ता, जिंस, चप्पल और बगल में थैला नुमा बैग यहीं इनकी पहचान है। एक तरफ लोग मिलेंगे जो कहेंगे ‘यू आर सो लक्की  यू आर लिविंग विद यौर फैमिली’ ये बात बात पर खुद को बाहरी बता कर इमोश्नली ब्लैकमेल करेंगे, तो दूसरी तरफ दिल्ली वालो को होस्टल लाईफ अच्छी लगेगी और बार बार बालेंगे जिंदगी के असली मजे तो तुम्हारे है यार। काश मैं भी हॉस्टल में होता.. एक प्रजाति ऐसी मिलेगी जो सिर्फ स्पोंसर्स को ही ढूंढने के लिए कॉलेज में आते है दरअसल में यह किसी न किसी सोसाइटी के हेड होते है। कॉलेज फेस्ट का सारा कारभार इन्ही के जिम्मे होता है।
कॉलेज का मतलब सिर्फ मस्ती ही नही होता है दोस्तो, पर हां यहा मस्ती और पढाई के साथ साथ बहुत कुछ नया सिखने को मिलेगा जो कि फ्यूचर में काम आयेगा ही आयेगा। जो भी करना पूरी शिद्दत के साथ करना। उज्व्वल भविष्य की शुभकामनाएं इस आशा के साथ कि रोज आपका इनमें से कुछ या सारे लोगो से सामना होगा ही। और अगर आपके बडे भाई बहन भी डीयू के ही प्रोडक्ट है तो उन्हे भी ऐसे लोगो से दो चार होना पडा ही होगा।

Sunday, 5 June 2016

गुस्सेल चिडिया

आज 3डी एनिमेटेड कॉमेडी, द एंग्री बर्ड्स मूवी देखी। हां वही गुस्सेल चिडिया, जो आंख निकाले, मुंह फुलाएं, नाक उठाये रहता है। जिसे हमने खेल खेल में न जाने कितनी बार खिंच खिंचकर सामने वाली इमारत को गिराते है। इस फिल्म को देखने के बाद यह समझ में आसानी हो जाती है कि हम सामने कि इमारत को  क्यों गिराते है। इस खेल में रेड, ब्लैक, येलो बर्ड्स काफी पसंद की जाती हैं और इनके इर्दगिर्द कहानी रच कर 'द एंग्री बर्ड्स मूवी' बनाई गई है। कम्प्यूटर एनिमेटेड इस फिल्म में एक्शन, एडवेंचर और कॉमेडी है। दरसल बर्ड आयलैंड में रहने वाला रेड बर्ड अक्सर नाराज रहता है। उसके साथी उसे आंखों के ऊपर मूंछ वाला कह कर चिढ़ाते हैं। रेड के गुस्से से परेशान होकर उसे एंगर मैनेजमेंट सीखने के लिए भेजा जाता है, जहां उसी की तरह चक (येलो बर्ड), बॉम्ब (ब्लैक बर्ड) और बिग रेड बर्ड भी अपने गुस्से को काबू में रखना सीख रहे हैं। इनमें अच्छी दोस्ती हो जाती है।  उसी दौरान आयलैंड पर ग्रीन पिगीज़ आते हैं जिनके खतरनाक इरादे रेड और उसके साथी भांप जाते हैं, लेकिन बर्ड आयलैंड वाले उनका कहा नहीं मानते और पिगीज़ की लुभावनी बातों में फंस जाते हैं। बर्ड्स के सारे अंडे पिगीज़ ले भागाते हैं। रेड और उसके साथी किस तरह से ये अंडे वापस लाते है। रेड बर्ड तो आपका दिल जीत लेता है। इनके कारनामे रोमांचित करते हैं। ग्रीन पिग्स के आने के बाद उम्मीद बंधती है कि कहानी में उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा, लेकिन थोड़ी निराशा होती है क्योंकि कहानी सीधी और सपाट है। ग्रीन पिग्स से अंडे वापस लाने वाली बात रोमांचक नहीं है और क्या होने वाला है इसका अंदाजा लगाना आसान है। क्लाइमैक्स थोड़ा बेहतर हो सकता था यदि इसमें बर्ड्स के कुछ और कारनामे देखने मिलते। इसके बावजूद फिल्म आपको दिलचस्प किरदारों के कारण ज्यादातर समय बांध कर रखती है।फिल्म का एनिमेशन आंखों को सुकून देता है। रेड, येलो और ब्लैक बर्ड्स भरपूर मनोरंजन करते हैं। माइटी ईगल वाले सीन गुदगुदाते हैं। यह फिल्म उन लोगों को ज्यादा पसंद आएगी जिन्होंने ये गेम खूब खेला है। 

Friday, 6 May 2016

मस्ती की नगरी: बनारस


पिछले कुछ दिन पहले बनारस घुम कर आया तब से कुछ दोस्तो ने पुछा कि कैसा है बनारस??? तो सोचा इस पर कुछ लिखकर ही बता दूं। लिखना चाहा तो समझ ही नहीं आ रहा कि क्या लिखूं कहां से शुरु करु, क्योकि बनारस को तो बनारस जा कर ही देखा जा सकता है, सुना जा सकता है, समझा जा सकता और जिया जा सकता है। टीवी और समाचारों में बनारस सिर्फ मंदिरों और घाटो तक ही सिमटा है और मुझ जैसे के लिए तो बनारस का मतलब ही मंदिर,घाट, साडी और पान था। लेकिन बनारस जाकर बहुत कुछ देखा और समझा। बनारस का मतलब धर्म, संस्कार, आस्था, इतिहास तो है ही, लेकिन पूर्व की ओर जाती पतली गलियां, सिर्फ पतली ही नहीं कब कहां मुड रही है पता ही नहीं यह गलियां है बनारस। कई जगह तो एक साथ दो बाईक भी नहीं जा सकते फिर भी बिना किसी झुंझलहट और किच किच के सिर्फ आंखो ही आंखो से समझाना और समझ कर बाईक निकालने की कला है बनारस। हर अच्छे काम पर हर हर महादेव का जयकारा लगाना है बनारस और जयकारा भी ऐसा जो कि एक असली बनारसी ही लगा सकता है। होहोहोहोहोहोर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रहोहोहोहोहोहोर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रहोहोहोहोहोहोर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रमहाआआआआदेएएएएएबब्। अब चाहे काशी विश्वनाथ मंदिर हो या संकट मोचन मंदिर या किसी शादी में वरमाला हर हर महादेव के जयकारा का अलग ही आनंद है बनारस। वरुणा और असी दो नदियों के बीच बसा शहर है बनारस और बनारस में एक कोने से दूसरे कोने में जाने पर इनके पुल को पार करना ही पडेगा। अस्सी घाट में प्रात:काल की आरती के साथ सुबह-ए-बनारस सूर्योदय का एक एक क्षण आंखों में बस जाना है बनारस। अस्सी और राजघाट के बीच के घाटों में दशाश्र्वमेध में संध्या की आरती, तो मणिकर्णिका घाट पर अघोरी, डोम और रात दिन जलती लाश है बनारस। घाटो पर नाविक, फूल बेचने वाले और पंडा की पहचान है बनारस। बनारस को यू ही मंदिरो का शहर नहीं कहा जाता पूरे बनारस में हर चौक चौराहे पर हर तीसरे मकान छोड मंदिर दिख जायेंगे। सुंदरकांड पाठ, राम धुनी, हर हर महादेव का जय घोष है बनारस। चाय और पान की दुकानों पर सामाजिक मुद्दे सुलझाते, बहस करते, सलाह देते लोगों की पहचान है बनारस हमउम्र लोगों की बातचीत में बात बात पर गरियाना (जिसे ये गाली नहीं समझते) है बनारस। कुल्हड (मिट्टी के बरतन) में चाय हो या लस्सी का स्वाद है बनारस। यहां कोई खाली नहीं मिलता, कुछ न कुछ करता ही रहता है, वो भी दुसरो के लिए, एक फोन पर एक दुसरे के लिए तय समय में ही हाजिर मिलते लोग है बनारस। यहां कोई अजनबी नहीं है, एक पल मिलने के साथ दुसरे क्षण ऐसा व्यवहार मिलता है जैसे कितने वर्षो से साथ है। यही दूसरे पर मरना और प्यार लुटाना है बनारस। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विश्वविद्यालय, सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, केन्द्रीय तिब्बती विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालय इसे ज्ञान की नगरी बनाते है। शायद तभी कहा जाता है कि बनारस में सिर्फ ज्ञान की वर्षा ही होती है। इसका उदाहरण वहा जाकर देख भी लिया, थोडी मिठी चाय बनाने के आग्रह पर उस चाय वाले चचा ने जो सुनाया, सुनाया क्या उन्होने तो समझाया, यही समझाना और अपनापन है बनारस। भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली, अशोक स्तंभ, चौखंडी स्तूप और जैन मंदिर मोक्ष की राह दिखाता सारनाथ है बनारस। काशी नरेश की आन बान और शान रामनगर का किला और संग्राहलय जिसे देखने के बाद आखें खुली की खुली रहना है बनारस। कचौडी सब्जी, लौंगलत्ता, समोसा, चाय, लस्सी, ठंडई और पान का स्वाद है बनारस। मस्ती मे रहने वाला, अपनी धुन मे रहने वाला, अपनी गति से चलने वाला और दिलो-दिमाग पर राज करने वाला शहर है बनारस।

Tuesday, 5 April 2016

पत्रकारिता या दलदल


       पत्रकारिता का क्षेत्र दूर से जितना आकर्षक लगता है, उसकी हकीकत उतनी ही बेकार है। शिफ्टों में काम करना, फील्ड की भागदौड़, बेहतर करने का तनाव पत्रकारों के शारीरिक के साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहा है। इन सब से इत्तर पत्रकार बनने की चाह रखने वाले आज के युवा वर्ग का जिस कदर शोषण किया जा रहा है वह किसी से छुपा नहीं है।
अनिश्चित दिनचर्या और खाने-पीने का कोई सही समय न हो पाने की वजह से पत्रकारों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जिस नाम-शौरहत पाने की ललक और समाज की बुराईओं को देश-दुनिया के सामने लाने के लिए इस दलदल में कदम रखता है वह बस इसमें गिरता ही चला जाता है। तभी तो राष्ट्रीय चैनलों में भी क्या शिफ्ट और क्या टाइम, बॉस के सामने खुद को साबित करने के लिए दिन रात काम करते रहते है। और यही बात बार बार अपने से निम्न पद पर बैठे व्यक्ति से बताते है परिणाम स्वरुप वह भी इसे ही अपना धर्म समझता है और खुद को साबित करने करने के लिए रात दिन एक कर देता है। लेकिन बाद में होता क्या है जरुरत न होने पर संस्थान द्वारा एक नोटिस दे कर दूसरे ही क्षण कर्मचारी को बाहर की रास्ता दिखा दिया जाता है। इंटर्न के नाम पर तो छात्रों से कम से कम 6 महिने मुफ्त में काम सिखाने के बहाने उसका शोषण किया जाता है और बाद में नौकरी के नाम पर सिर्फ दिलासा ही दी जाती है कि बहुत जल्द तुम्हे बुलायेंगे और इस इंतजार में रहता है की कब फोन आये। कुछ हिम्मत करके दुसरे संस्थान में जाता है तो वहां भी यहीं प्रक्रिया अधिकांश छात्र कुछ समय तक संघर्ष करते है और फिर बाद में कोई गल्त कदम उठाने पर मजबूर है जाते है। खबरों की दुनिया में मुख्यधारा की पत्रकारिता की अपनी अलग चुनौतियां तो हैं ही, ग्रामीण इलाकों में भी चुनौतियां कुछ कम नहीं हैं। संसाधनों की कमी से जूझते ग्रामीण पत्रकार की चुनौतियों में से सबसे बड़ी चुनौती अनियमित तनख्वाह है। कई बार तो इन पत्रकारों को दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। इसलिए गांवों में जो भी लोग पत्रकारिता से जुड़े हैं वे कोशिश करते हैं कि उनके पास आय के दूसरे स्रोत भी हों ताकि परिवार का खर्च चलाने में मुश्किलें न आएं। तभी देश के नामी पत्रकारों में से एक रविश कुमार को अपने ब्लॉग में लिखना पडता है कभी रविश कुमार मत बनना। या पत्रकारिता की पढाई कर रहे छात्रों को क्लास में या क्लास के बाहर प्रोफेसरों द्वारा आसानी से यह कहते हुए देखा जाता है कि बेटा किसी और पेशे की ओर भी ध्यान दो मगर छात्र को तो जिद्द होती है कि वह पत्रकारिता ही करेगा और अपनी काबिलियत को सिद्ध करते हुये इस दुनिया को सच्चाई की राह पर ले जायेगा। वह जी-जान लगा कर अपने मालिक को खुश करने के लिए खुब मेहनत करता है। साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ दाव पर लगा कर अपने साथी कर्मचारी से आगे निकलने के लिए हर संभव प्रयास करता है और कब इस दलदल में फसता है यह उसे समझ ही नहीं आता और अगर समझ आता भी है तो तबतक बहुत देर हो चुकी होती है। कुल मिला कर यह एक ऐसा दलदल है जो एक बार इसमें आया बस इसी में फसता चला गया।

Friday, 1 January 2016

साल 2015


देखते ही देखते साल 2015 भी जाने वाला है। हर साल की तरह यह साल भी कुछ खट्टी मिठी यादें देकर जा रहा है। राजनीति दृष्टिकोण से भी 2015 कई मायनो में यादगार रहने वाला है। साल की शुरुआत में ही योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया। वहीं दिल्ली में विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी ने 70 सीटों में से 67 सीटों पर कब्जाकर नया कीर्तिमान रच डाला है और बीजेपी को महज 3 सीटों पर ही संतोष करने के लिए मजबूर कर दिया। तो साल के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनाव भी हमेशा के लिए यादगार बन गया। विकास के मुद्दे पर शुरु हुआ चुनाव प्रचार सारी हदें पार करता हुआ शैतान और ब्रह्मपिशाच तक जा पहुंचा। मोदी द्वारा सवा लाख करोड रुपये के पैकेज के ऐलान पर आरएसएस प्रमुख के आरक्षण की समीक्षा वाला बयान भारी पडा। दादरी में अखलाक की हत्या, बीफकार्ड और दाल 200 रुपये के पार जाने से बिहार चुनाव के ऐसे नतीजे आये जिसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी। राजनीतिक पंडित भी असमंजस में दिखे। समूचा मंत्रीमंडल द्वारा भाजपा के लिए प्रचार करने के वाबजूद भाजपा को बिहार में भी हार का सामना करना पडा तो वही आरजेडी ने सबसे ज्यादा सीट जीत कर सबको चौका दिया। विपक्ष ने हर छोटे बडे मुद्दे पर सरकार को घेरा चाहे एफटीआइआइ में गजेंद्र चौहान की न्युक्ति का मामला हो या फिर शिक्षा के निजीकरण की बात, दादरी में अखलाक की हत्या, तो व्यापम घोटाले से जुडे गवाहों और लोगो की एक के बाद एक संदिग्ध रुप से मौत ने सरकार को ही कटघरे में खडा कर दिया। कलबुर्गी की हत्या के बाद तो मानो सम्मान वापसी की बाढ ही आ गयी। मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र भूमिअधिग्रहण, बीफ,जीएसटी और नेश्नल हेराल्ड जैसे मुद्दे पर विपक्ष के हंगामे के चलते टप रहा।बस आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। बरहाल 2015 प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरे के कारण भी याद किया जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मार्च में सेशेल्स और मॉरिशस होते हुए वे श्रीलंका पहुंचे और मार्च के अंत में वे सिंगापुर भी गए तो अप्रैल में मोदी ने सबसे पहले फ्रांस में राफाल लड़ाकू विमानों का सौदा तय किया। फ्रेंच स्पेस एजेंसी में उन्होंने भारतीय छात्रों से मिले इसके बाद वे जर्मनी पहुंचे जहां उन्होंने चांसलर अंगेला मैर्केल के साथ हनोवर मेले का उद्घाटन किया। राजधानी बर्लिन में उन्होंने जर्मनी में रह रहे भारतीयों को संबोधित किया और यहां से वे कनाडा गए। मई में मोदी चीन के बाद वे मंगोलिया और फिर दक्षिण कोरिया पहुंचे। दक्षिण कोरिया के साथ उन्होंने सात समझौतों पर हस्ताक्षर किए। जून की शुरुआत में मोदी बांग्लादेश पहुंचे। प्रधानमंत्री शेख हसीना के अलावा वे राष्ट्रपति अब्दुल हामिद से भी मिले। इस दौरान मोदी की शेख हसीना पर महिला होने "के बावजूद" सफल होने की टिप्पणी आलोचनाओं में घिरी रही। जुलाई में वे रूस और पांच अन्य एशियाई देशों का दौरे पर गए। इनमें कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। मोदी ने रूस में सातवें ब्रिक्स सम्मलेन में भाग लिया। अगस्त के मध्य में प्रधानमंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात का दो दिवसीय दौरा किया। यात्रा के पहले दिन वे शेख जायद मस्जिद गए जो कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र के दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी ने जी-4 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। ब्रिटेन दौरे पर प्रधानमंत्री ने महारानी एलिजाबेथ और शाही परिवार के साथ भोजन किया, प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के साथ बातचीत की और बेंबली स्टेडियम में भारतीय मूल के हजारों लोगों को संबोधित किया। तुर्की के अंताल्या में मोदी ने जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस सम्मेलन को मुख्यतः पर्यावरण सम्मेलन होना था लेकिन पेरिस पर आतंकी हमले के बाद मुख्य ध्यान आतंकवाद और आईएस से लड़ने पर रहा। दिसंबर में नरेंद्र मोदी ने वार्षिक भारत-रूस सम्मेलन में भाग लेने के लिए 24-25 दिसंबर को रूस की यात्रा की।तो अफगानिस्‍तान में भारत द्वाना निर्मित नए संसद भवन का उद्घाटन किया और काबुल से लौटते वक्‍त लाहौर में रुकने का अचानक फैसले ने सबको चौका दिया। प्रधानमंत्री मोदी इन देशो को भारत में निवेश के लिए कितना रिझा पाए और मेक इन इंडिया कितना कारगर हुआ यह तो समय ही बताएगा लेकिन सूट बूट की सरकार और फ्लाइट मोड की सरकार जैसे तंज काफी चर्चे में रहे। साल के अंत में भी माहौल काफी हंगामेदार ही रहा डीडीसीए में चल रहे भ्रष्टाचार के खुलासे से आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। उम्मीद करते है कि आने वाले साल में केंद्र-राज्य और सरकार-विपक्ष का आरोप प्रत्यारोप का दौर खत्म हो। देश की उन्नति के लिए, जनहित के लिए काम हो।