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Thursday, 31 October 2019

एकता का संदेश देता महापर्व छठ


दिपावली और उसके साथी पर्व यानि कि गोवर्धन पूजा, भैयादूज के समापन के साथ ही बिहार राज्य में मनाये जाने वाले महापर्व छठ की तैयारी शुरू हो जाती है... गली मोहल्ले में छठ के गीत सुनते ही घाट, दीप, अर्घ देती व्रती, गन्ना, घाट की सजावट आदि न जाने कितनी ही चीजें आंखों के सामने आ जाती है...

लोक आस्था का महापर्व छठ चार दिन का त्योहार होता है..,  जो कि कार्तिक मास कि शुक्तल चतुर्थी से शुरु होकर सप्तमी तक चलता है... इस महापर्व के पहले दिन को नहाय-खाय कहते है जिसमे छठ व्रती नहा-धोकर शुद्ध खाना खाती है... जिसमें दाल-चावल, कद्दू (घीया) की सब्जी, गाय का दूध आदि का सेवन करती है... खाने में लहसुन-प्याज, मांस आदि विशेष रूप से प्रतिबंधित होता है...

महापर्व के दूसरे यानि कि पंचमी को खरना कहते है जिसमे व्रती पूरे दिन निराजल व्रत करती है और शाम को नहा-धोकर खीर का प्रसाद बनाती है... यह खीर का प्रसाद मिट्टी के चूल्हे पर दूध चावल और गुड़ से बनाया जाता है... छठ व्रती शाम को पूजा-अर्चना करने के बात एकांत में प्रसाद ग्रहण करती है... साथ ही आस पड़ोस के लोगों और परिजनों को प्रसाद बांटा जाता है... इस दिन व्रती जमीन पर चटाई और साफ चादर बिछा कर सोती है...

महापर्व के तीसरा दिन षष्ठी को मनाया जाता है जिस दिन छठ व्रती दिन भर निराजल व्रत कर शाम के अर्घ की तैयारी करती है... जिसमे प्रसाद के लिए ठेकुआ, सांच (आटा और चीनी के साथ बनी एक मिठाई),  मालपुआ,गुजिया, चावल का लड्डू और खाजा आदि घर पर बनाती है... शाम के वक्त व्रती परिवार के साथ छठ घाट पर पहुंती है... घर के पुरुष-बच्चे दो-तीन बड़ी बांस की टोकरी में सूप, पानी वाला नारियल, गन्ना, लोटा, लाल सिंदूर, धूप, बड़ा दीपक, चावल, थाली, दूध, गिलास, अदरक और कच्ची हल्दी, केला, सेब, सिंघाड़ा, नाशपाती, मूली, आम के पत्ते, शकरगंदी, टाब नींबू (मीठा नींबू), मिठाई, शहद, पान, सुपारी, कुमकुम और चंदन आदि अनेक पूजा के इस्तेमाल में आने वाले सामान को सिर पर रख कर लेकर घाट तक जाते है...  व्रती कमर भर पानी में खड़े रह कर डूबते हुए सूर्य को अर्घ देते हुए प्रसाद अर्पण करती है... सूर्य अस्त के बाद घर आकर निराजल ही जमीन पर चटाई चादर आदि बिछा कर आराम करती है...
छठ महापर्व का चौथा और आखिरी दिन सप्तमी के दिन होता है जिस दिन व्रती सूर्य उदय से पहले है पिछली शाम की तरह सपरिवार पूरे सामान-प्रसाद के साथ घाट पर जाती है... और कमर भर पानी में खड़े हो कर सूर्य उदय का इंतजार करती है, प्रार्थना करती है... और उगते हुए सूर्य को अर्घ देती है.. प्रसाद अर्पण करती है... और अपने घर-परिवार कि खुशहाली की प्रार्थना करती है... बाद में कथा सुनने के बाद प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही इस चार दिवसीय पर्व का समापन होता है...


छठ पर्व महापर्व इसलिए भी बन जाता है क्योंकि इसमें समाज के सभी वर्गो के लोगो के योगदान के बिना यह पर्व असंभव है... बांस के सूप डाला के लिए डोम, मिट्टी के दिये, मटके के लिए कुम्हार, नहाय-खाय से पूर्व नाखून आदि कटवाने के लिए नाई आदि लोगों की जरूरत होती है... यह पर्व समाज के सभी वर्गो को एक साथ लाता है जहां व्रती किसी भी जाति-वर्ग का हो सबके लिए समान ही होता है... एक ही नदी, तालाब पोखर में सभी जाति-वर्ग के लोग खड़े होकर अर्घ देते है... यह पर्व समाज में ऊंच-नीच और भेदभाव को खत्म करता है और एकता का संदेश देता है... शायद तभी यह पर्व बिहार के साथ-साथ भारतवर्ष के अनेक राज्यों में और यहां तक कि विदेशों में भी अपनी जगह बना पाया है....