बजट जिसे देखने के लिए एक होड़ सी मच गयी थी ऐसा नज़ारा तो बचपन में भारत पाकिस्तान के मैच में देखने को मिलता था। कल हर किसी की निगाहे बजट पर ही थी मध्यम वर्ग तो कुछ ज्यादा ही उत्सुक था ये देखने के लिए की किस तरह अच्छे दिन आने वाले है।
शुरुआत हुई अपनी वाह वाही लूटते हुए की किस तरह जन धन योजना से करोडो लोगो का खाता खोला, कोयले की नीलामी और स्वच्छ भारत अभियान से कैसे देशहित में काम किया। गरीबी रेखा से निचे वालो के लिए जनधन आधार मोबाइल , गरीबी उन्नमूलन , 20,000 गावों में बिजली पहुचना , सिंचाई योजना, प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना , अटल पेंशन योजना , प्रधानमंत्री जीवन बीमा , मनरेगा आवास को सड़क तक जोड़ना जैसी योजना सुन कर मन में और उत्त्सुकता जागी और इंतज़ार था मध्यम वर्ग के लिए पिटारे में से कुछ निकलने का परन्तु अब सुनने को मिला कृषि से आय , निजी निवेश , मेनुफैचरी में पिछड़ापन, सरकारी घाटा काबू करना और योजनाये बरकरार रखना आदि सरकार के सामने चुनौतियां है। तभी कुछ कुछ समझ में आया की कुछ ख़ास नहीं है हमारे लिए। फिर भी उम्मीद बांधे टीवी के आगे आँख गढ़ाए बैठा रहा।
रक्षा क्षेत्र , स्वास्थ्य ,शिक्षा , आवास शहरी विकास, नमामि गंगे आदि का हिस्सा देने के बाद कम्पनी कर में 5 फीसद की कमी करना, संपत्ति कर खत्म करते हुए 1 करोड़ से अधिक की आय वालो पर 2 फीसद कर में वृद्धिं करना आदि समझा रहा था की कैसे कॉपरेटो की मदद की जा रही है अब मध्यम वर्ग के लिए आयकर में बिना फेर बदल करते हुए सेवाकर में 2 फीसद वृद्धि का फरमान सुनाया तभी दिमाग में ख्याल आया की क्या इसी का मैं इंतज़ार कर रहा था मतलब खाना - पीना, इंटरनेट ,मोबाइल बिल , केबल जैसी सभी चीजे महंगी। इतने में सुनने को आया आया की 'मिडिल क्लास अपना ख्याल खुद रखे' ये काफी था घाव पर नमक जैसा काम करने के लिए और समझ आने लगा की चुनाव से पहले 'अच्छे दिन आने ' की बात किस के लिए थी।
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