Saturday, 21 March 2015

एक नक़ाब

मनुष्य भी कितना अजीब है अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए हमेशा एक नक़ाब ओढ़े रखता है तभी  तो घर में  कुछ और, और बाहर कुछ और।  हालाँकि मानव प्रवृति ही कुछ ऐसी  है अपने आपको बेहतर  दिखाने के लिए झूठे पहनावे , खानपान के साथ साथ घर से निकलते ही दुसरो से विनम्रता से पेश आना , न चाहते हुए भी झूठी मुस्कान के साथ मिलना , हाथ मिलाना और जाते जाते मिल के अच्छा लगा जैसे झूठ बोलते है बेशक अंदर ही अंदर उसे कोस ही क्यों  न रहे हो।

हमेशा मुस्कुराने वाला व्यक्ति खुशमिज़ाज , हसमुख होने के बजाय शातिर , चालाक , खतरनाक ही नहीं खलनायक भी हो सकता है। तभी तो माला जपने वाले धर्मगुरु भी कालेकारनामे करते हुए देखे जाते है। कई बार तो इंसान जरुरत से ज्यादा विनम्रता से पेश आता है  और तारीफों के पल  बंधता है  तो समझिए मामला गड़बड़ है।  इस तरह की  तारीफे सुन कर कभी कभार हसी आती है की कैसे कोई इतना झूठ बोल सकता है।

वास्तव में अपने आप को बेहतर साबित करने के चक्कर में अपनी एक झूठी  छवि पेश करता है इस तरह वह सामने वाले के साथ साथ खुद को भी धोखा देता है। तभी तो कहते है जो दिखता है वो होता नहीं और जो  होता है वह दिखता नहीं। 

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