Wednesday, 20 July 2016

कॉलेज माने सिर्फ मस्ती नहीं

      स्कूल लाईफ खत्म अब तो मस्ती के दिन है यारो। जैसे तैसे दिल्ली विश्वविद्यालय में एडमिशन हो ही गया। दिल्ली युनिवर्सिटी के किसी भी कॉलेज में एडमिशन हो गया तो मानो तीन साल की तो मौज है। कॉलेज चाहे कोई भी हो मगर कुछ चीजें सारे कॉलेज एक जैसी होती है। जैसे पहले ही दिन कन्वोकेशन प्रोग्राम जिसमें आधे से ज्यादा टाईम तो यही ढूंढने में लग जायेगा कि ऑडिटोरियम कहां है। ऑडी में यहां आपके आस पास में जो भी बंदे होंगे वो आपके कोर्स के नहीं होंगे। इनमें से एक आपका दोस्त बन जायेगा और बाद में इसके मिलने पर हमेशा यह तुम्हे अपने दोस्तो को बताना पडेगा कि कौन है यह। कॉलेज में कुछ लोग ऐसे भी मिलेंगे जो पहले ही दिन से इस केल्कुलेशन में जुट जायेंगे कि कॉलेज में कितनी लडकिया है और किसे पटाया जाये, क्योकि इनका मानना होता है कि शुरु के दो तीन दिन में अगर कोई पट गयी तो पट गयी वर्ना ठनठन गोपाल। एक जमात ऐसी मिलेगी जो हिन्दी मीडियम वालो को ऐसे हीन नजर से देखेगी कि मानो एलिजाबेथ कि पोते-पोती यही है। यह अकसर कॉलेज के बाहर खोके पर सुट्टे मारते, पब-डिस्क, और दो ब्रांड में कम्पैरिजन करते नजर आयेंगे बेशक खुद कमला नगर औऱ पालिका के कपडे पहनते हो। हर डिपार्टमेंट में एक लडका तो ऐसा होगा ही जो शुरुआती दिनों में गिटार लाता हो। गुलाबी आंखे जो तेरी देखी यह इनका फेवरेट सॉंग होता है। कॉलेज में ऐसे बंदे भी मिलेंगे जो ज्ञान की उल्टियां करते रहते हो। यह दिन के चौब्बीस घंटे में से पच्चीस घंटे पढते है। इन्हें मार्केट में बुक लॉंच होने के कुछ ही घंटो के बाद वो बुक इनके पास होने का खिताब होता है। एक पलटन ऐसी होगी जो सिर्फ कॉलेज के गेट के बाहर और कॉलेज के कैंटीन में ही मिलेगी। इनकी फेवरेट लाईन होती है ‘बेलेट नम्बर .. प्लीज वोट फॉर ...’ शुरुआती दिनो में यह बहुत व्यस्त रहते है। कब कहा धऱना देना है इन्हे बखूबी पता होता है। ढपली, स्लोगन और मंच आदि की व्यवस्था करने में यह माहिर होते है। कुछ ऐसे भी महापुरुष मिलेंगे जिन्हें देख लगेगा कि इन्होने जीवन की सच्चाई को जान लिया है। कौन क्या सोचता है इन्हे इस बात से कोई फर्क नहीं पडता। बडी दाढी, बडे बाल के साथ कुर्ता, जिंस, चप्पल और बगल में थैला नुमा बैग यहीं इनकी पहचान है। एक तरफ लोग मिलेंगे जो कहेंगे ‘यू आर सो लक्की  यू आर लिविंग विद यौर फैमिली’ ये बात बात पर खुद को बाहरी बता कर इमोश्नली ब्लैकमेल करेंगे, तो दूसरी तरफ दिल्ली वालो को होस्टल लाईफ अच्छी लगेगी और बार बार बालेंगे जिंदगी के असली मजे तो तुम्हारे है यार। काश मैं भी हॉस्टल में होता.. एक प्रजाति ऐसी मिलेगी जो सिर्फ स्पोंसर्स को ही ढूंढने के लिए कॉलेज में आते है दरअसल में यह किसी न किसी सोसाइटी के हेड होते है। कॉलेज फेस्ट का सारा कारभार इन्ही के जिम्मे होता है।
कॉलेज का मतलब सिर्फ मस्ती ही नही होता है दोस्तो, पर हां यहा मस्ती और पढाई के साथ साथ बहुत कुछ नया सिखने को मिलेगा जो कि फ्यूचर में काम आयेगा ही आयेगा। जो भी करना पूरी शिद्दत के साथ करना। उज्व्वल भविष्य की शुभकामनाएं इस आशा के साथ कि रोज आपका इनमें से कुछ या सारे लोगो से सामना होगा ही। और अगर आपके बडे भाई बहन भी डीयू के ही प्रोडक्ट है तो उन्हे भी ऐसे लोगो से दो चार होना पडा ही होगा।

Sunday, 5 June 2016

गुस्सेल चिडिया

आज 3डी एनिमेटेड कॉमेडी, द एंग्री बर्ड्स मूवी देखी। हां वही गुस्सेल चिडिया, जो आंख निकाले, मुंह फुलाएं, नाक उठाये रहता है। जिसे हमने खेल खेल में न जाने कितनी बार खिंच खिंचकर सामने वाली इमारत को गिराते है। इस फिल्म को देखने के बाद यह समझ में आसानी हो जाती है कि हम सामने कि इमारत को  क्यों गिराते है। इस खेल में रेड, ब्लैक, येलो बर्ड्स काफी पसंद की जाती हैं और इनके इर्दगिर्द कहानी रच कर 'द एंग्री बर्ड्स मूवी' बनाई गई है। कम्प्यूटर एनिमेटेड इस फिल्म में एक्शन, एडवेंचर और कॉमेडी है। दरसल बर्ड आयलैंड में रहने वाला रेड बर्ड अक्सर नाराज रहता है। उसके साथी उसे आंखों के ऊपर मूंछ वाला कह कर चिढ़ाते हैं। रेड के गुस्से से परेशान होकर उसे एंगर मैनेजमेंट सीखने के लिए भेजा जाता है, जहां उसी की तरह चक (येलो बर्ड), बॉम्ब (ब्लैक बर्ड) और बिग रेड बर्ड भी अपने गुस्से को काबू में रखना सीख रहे हैं। इनमें अच्छी दोस्ती हो जाती है।  उसी दौरान आयलैंड पर ग्रीन पिगीज़ आते हैं जिनके खतरनाक इरादे रेड और उसके साथी भांप जाते हैं, लेकिन बर्ड आयलैंड वाले उनका कहा नहीं मानते और पिगीज़ की लुभावनी बातों में फंस जाते हैं। बर्ड्स के सारे अंडे पिगीज़ ले भागाते हैं। रेड और उसके साथी किस तरह से ये अंडे वापस लाते है। रेड बर्ड तो आपका दिल जीत लेता है। इनके कारनामे रोमांचित करते हैं। ग्रीन पिग्स के आने के बाद उम्मीद बंधती है कि कहानी में उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा, लेकिन थोड़ी निराशा होती है क्योंकि कहानी सीधी और सपाट है। ग्रीन पिग्स से अंडे वापस लाने वाली बात रोमांचक नहीं है और क्या होने वाला है इसका अंदाजा लगाना आसान है। क्लाइमैक्स थोड़ा बेहतर हो सकता था यदि इसमें बर्ड्स के कुछ और कारनामे देखने मिलते। इसके बावजूद फिल्म आपको दिलचस्प किरदारों के कारण ज्यादातर समय बांध कर रखती है।फिल्म का एनिमेशन आंखों को सुकून देता है। रेड, येलो और ब्लैक बर्ड्स भरपूर मनोरंजन करते हैं। माइटी ईगल वाले सीन गुदगुदाते हैं। यह फिल्म उन लोगों को ज्यादा पसंद आएगी जिन्होंने ये गेम खूब खेला है। 

Friday, 6 May 2016

मस्ती की नगरी: बनारस


पिछले कुछ दिन पहले बनारस घुम कर आया तब से कुछ दोस्तो ने पुछा कि कैसा है बनारस??? तो सोचा इस पर कुछ लिखकर ही बता दूं। लिखना चाहा तो समझ ही नहीं आ रहा कि क्या लिखूं कहां से शुरु करु, क्योकि बनारस को तो बनारस जा कर ही देखा जा सकता है, सुना जा सकता है, समझा जा सकता और जिया जा सकता है। टीवी और समाचारों में बनारस सिर्फ मंदिरों और घाटो तक ही सिमटा है और मुझ जैसे के लिए तो बनारस का मतलब ही मंदिर,घाट, साडी और पान था। लेकिन बनारस जाकर बहुत कुछ देखा और समझा। बनारस का मतलब धर्म, संस्कार, आस्था, इतिहास तो है ही, लेकिन पूर्व की ओर जाती पतली गलियां, सिर्फ पतली ही नहीं कब कहां मुड रही है पता ही नहीं यह गलियां है बनारस। कई जगह तो एक साथ दो बाईक भी नहीं जा सकते फिर भी बिना किसी झुंझलहट और किच किच के सिर्फ आंखो ही आंखो से समझाना और समझ कर बाईक निकालने की कला है बनारस। हर अच्छे काम पर हर हर महादेव का जयकारा लगाना है बनारस और जयकारा भी ऐसा जो कि एक असली बनारसी ही लगा सकता है। होहोहोहोहोहोर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रहोहोहोहोहोहोर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रहोहोहोहोहोहोर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रर्रमहाआआआआदेएएएएएबब्। अब चाहे काशी विश्वनाथ मंदिर हो या संकट मोचन मंदिर या किसी शादी में वरमाला हर हर महादेव के जयकारा का अलग ही आनंद है बनारस। वरुणा और असी दो नदियों के बीच बसा शहर है बनारस और बनारस में एक कोने से दूसरे कोने में जाने पर इनके पुल को पार करना ही पडेगा। अस्सी घाट में प्रात:काल की आरती के साथ सुबह-ए-बनारस सूर्योदय का एक एक क्षण आंखों में बस जाना है बनारस। अस्सी और राजघाट के बीच के घाटों में दशाश्र्वमेध में संध्या की आरती, तो मणिकर्णिका घाट पर अघोरी, डोम और रात दिन जलती लाश है बनारस। घाटो पर नाविक, फूल बेचने वाले और पंडा की पहचान है बनारस। बनारस को यू ही मंदिरो का शहर नहीं कहा जाता पूरे बनारस में हर चौक चौराहे पर हर तीसरे मकान छोड मंदिर दिख जायेंगे। सुंदरकांड पाठ, राम धुनी, हर हर महादेव का जय घोष है बनारस। चाय और पान की दुकानों पर सामाजिक मुद्दे सुलझाते, बहस करते, सलाह देते लोगों की पहचान है बनारस हमउम्र लोगों की बातचीत में बात बात पर गरियाना (जिसे ये गाली नहीं समझते) है बनारस। कुल्हड (मिट्टी के बरतन) में चाय हो या लस्सी का स्वाद है बनारस। यहां कोई खाली नहीं मिलता, कुछ न कुछ करता ही रहता है, वो भी दुसरो के लिए, एक फोन पर एक दुसरे के लिए तय समय में ही हाजिर मिलते लोग है बनारस। यहां कोई अजनबी नहीं है, एक पल मिलने के साथ दुसरे क्षण ऐसा व्यवहार मिलता है जैसे कितने वर्षो से साथ है। यही दूसरे पर मरना और प्यार लुटाना है बनारस। बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, महात्मा गांधी काशी विश्वविद्यालय, सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, केन्द्रीय तिब्बती विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालय इसे ज्ञान की नगरी बनाते है। शायद तभी कहा जाता है कि बनारस में सिर्फ ज्ञान की वर्षा ही होती है। इसका उदाहरण वहा जाकर देख भी लिया, थोडी मिठी चाय बनाने के आग्रह पर उस चाय वाले चचा ने जो सुनाया, सुनाया क्या उन्होने तो समझाया, यही समझाना और अपनापन है बनारस। भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली, अशोक स्तंभ, चौखंडी स्तूप और जैन मंदिर मोक्ष की राह दिखाता सारनाथ है बनारस। काशी नरेश की आन बान और शान रामनगर का किला और संग्राहलय जिसे देखने के बाद आखें खुली की खुली रहना है बनारस। कचौडी सब्जी, लौंगलत्ता, समोसा, चाय, लस्सी, ठंडई और पान का स्वाद है बनारस। मस्ती मे रहने वाला, अपनी धुन मे रहने वाला, अपनी गति से चलने वाला और दिलो-दिमाग पर राज करने वाला शहर है बनारस।

Tuesday, 5 April 2016

पत्रकारिता या दलदल


       पत्रकारिता का क्षेत्र दूर से जितना आकर्षक लगता है, उसकी हकीकत उतनी ही बेकार है। शिफ्टों में काम करना, फील्ड की भागदौड़, बेहतर करने का तनाव पत्रकारों के शारीरिक के साथ मानसिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचा रहा है। इन सब से इत्तर पत्रकार बनने की चाह रखने वाले आज के युवा वर्ग का जिस कदर शोषण किया जा रहा है वह किसी से छुपा नहीं है।
अनिश्चित दिनचर्या और खाने-पीने का कोई सही समय न हो पाने की वजह से पत्रकारों के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। जिस नाम-शौरहत पाने की ललक और समाज की बुराईओं को देश-दुनिया के सामने लाने के लिए इस दलदल में कदम रखता है वह बस इसमें गिरता ही चला जाता है। तभी तो राष्ट्रीय चैनलों में भी क्या शिफ्ट और क्या टाइम, बॉस के सामने खुद को साबित करने के लिए दिन रात काम करते रहते है। और यही बात बार बार अपने से निम्न पद पर बैठे व्यक्ति से बताते है परिणाम स्वरुप वह भी इसे ही अपना धर्म समझता है और खुद को साबित करने करने के लिए रात दिन एक कर देता है। लेकिन बाद में होता क्या है जरुरत न होने पर संस्थान द्वारा एक नोटिस दे कर दूसरे ही क्षण कर्मचारी को बाहर की रास्ता दिखा दिया जाता है। इंटर्न के नाम पर तो छात्रों से कम से कम 6 महिने मुफ्त में काम सिखाने के बहाने उसका शोषण किया जाता है और बाद में नौकरी के नाम पर सिर्फ दिलासा ही दी जाती है कि बहुत जल्द तुम्हे बुलायेंगे और इस इंतजार में रहता है की कब फोन आये। कुछ हिम्मत करके दुसरे संस्थान में जाता है तो वहां भी यहीं प्रक्रिया अधिकांश छात्र कुछ समय तक संघर्ष करते है और फिर बाद में कोई गल्त कदम उठाने पर मजबूर है जाते है। खबरों की दुनिया में मुख्यधारा की पत्रकारिता की अपनी अलग चुनौतियां तो हैं ही, ग्रामीण इलाकों में भी चुनौतियां कुछ कम नहीं हैं। संसाधनों की कमी से जूझते ग्रामीण पत्रकार की चुनौतियों में से सबसे बड़ी चुनौती अनियमित तनख्वाह है। कई बार तो इन पत्रकारों को दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है। इसलिए गांवों में जो भी लोग पत्रकारिता से जुड़े हैं वे कोशिश करते हैं कि उनके पास आय के दूसरे स्रोत भी हों ताकि परिवार का खर्च चलाने में मुश्किलें न आएं। तभी देश के नामी पत्रकारों में से एक रविश कुमार को अपने ब्लॉग में लिखना पडता है कभी रविश कुमार मत बनना। या पत्रकारिता की पढाई कर रहे छात्रों को क्लास में या क्लास के बाहर प्रोफेसरों द्वारा आसानी से यह कहते हुए देखा जाता है कि बेटा किसी और पेशे की ओर भी ध्यान दो मगर छात्र को तो जिद्द होती है कि वह पत्रकारिता ही करेगा और अपनी काबिलियत को सिद्ध करते हुये इस दुनिया को सच्चाई की राह पर ले जायेगा। वह जी-जान लगा कर अपने मालिक को खुश करने के लिए खुब मेहनत करता है। साम, दाम, दंड, भेद सब कुछ दाव पर लगा कर अपने साथी कर्मचारी से आगे निकलने के लिए हर संभव प्रयास करता है और कब इस दलदल में फसता है यह उसे समझ ही नहीं आता और अगर समझ आता भी है तो तबतक बहुत देर हो चुकी होती है। कुल मिला कर यह एक ऐसा दलदल है जो एक बार इसमें आया बस इसी में फसता चला गया।

Friday, 1 January 2016

साल 2015


देखते ही देखते साल 2015 भी जाने वाला है। हर साल की तरह यह साल भी कुछ खट्टी मिठी यादें देकर जा रहा है। राजनीति दृष्टिकोण से भी 2015 कई मायनो में यादगार रहने वाला है। साल की शुरुआत में ही योजना आयोग का नाम बदलकर नीति आयोग कर दिया। वहीं दिल्ली में विधानसभा चुनाव में अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी ने 70 सीटों में से 67 सीटों पर कब्जाकर नया कीर्तिमान रच डाला है और बीजेपी को महज 3 सीटों पर ही संतोष करने के लिए मजबूर कर दिया। तो साल के अंत में हुए बिहार विधानसभा चुनाव भी हमेशा के लिए यादगार बन गया। विकास के मुद्दे पर शुरु हुआ चुनाव प्रचार सारी हदें पार करता हुआ शैतान और ब्रह्मपिशाच तक जा पहुंचा। मोदी द्वारा सवा लाख करोड रुपये के पैकेज के ऐलान पर आरएसएस प्रमुख के आरक्षण की समीक्षा वाला बयान भारी पडा। दादरी में अखलाक की हत्या, बीफकार्ड और दाल 200 रुपये के पार जाने से बिहार चुनाव के ऐसे नतीजे आये जिसकी किसी को भी उम्मीद नहीं थी। राजनीतिक पंडित भी असमंजस में दिखे। समूचा मंत्रीमंडल द्वारा भाजपा के लिए प्रचार करने के वाबजूद भाजपा को बिहार में भी हार का सामना करना पडा तो वही आरजेडी ने सबसे ज्यादा सीट जीत कर सबको चौका दिया। विपक्ष ने हर छोटे बडे मुद्दे पर सरकार को घेरा चाहे एफटीआइआइ में गजेंद्र चौहान की न्युक्ति का मामला हो या फिर शिक्षा के निजीकरण की बात, दादरी में अखलाक की हत्या, तो व्यापम घोटाले से जुडे गवाहों और लोगो की एक के बाद एक संदिग्ध रुप से मौत ने सरकार को ही कटघरे में खडा कर दिया। कलबुर्गी की हत्या के बाद तो मानो सम्मान वापसी की बाढ ही आ गयी। मानसून सत्र और शीतकालीन सत्र भूमिअधिग्रहण, बीफ,जीएसटी और नेश्नल हेराल्ड जैसे मुद्दे पर विपक्ष के हंगामे के चलते टप रहा।बस आरोप प्रत्यारोप का दौर चलता रहा। बरहाल 2015 प्रधानमंत्री मोदी के विदेश दौरे के कारण भी याद किया जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मार्च में सेशेल्स और मॉरिशस होते हुए वे श्रीलंका पहुंचे और मार्च के अंत में वे सिंगापुर भी गए तो अप्रैल में मोदी ने सबसे पहले फ्रांस में राफाल लड़ाकू विमानों का सौदा तय किया। फ्रेंच स्पेस एजेंसी में उन्होंने भारतीय छात्रों से मिले इसके बाद वे जर्मनी पहुंचे जहां उन्होंने चांसलर अंगेला मैर्केल के साथ हनोवर मेले का उद्घाटन किया। राजधानी बर्लिन में उन्होंने जर्मनी में रह रहे भारतीयों को संबोधित किया और यहां से वे कनाडा गए। मई में मोदी चीन के बाद वे मंगोलिया और फिर दक्षिण कोरिया पहुंचे। दक्षिण कोरिया के साथ उन्होंने सात समझौतों पर हस्ताक्षर किए। जून की शुरुआत में मोदी बांग्लादेश पहुंचे। प्रधानमंत्री शेख हसीना के अलावा वे राष्ट्रपति अब्दुल हामिद से भी मिले। इस दौरान मोदी की शेख हसीना पर महिला होने "के बावजूद" सफल होने की टिप्पणी आलोचनाओं में घिरी रही। जुलाई में वे रूस और पांच अन्य एशियाई देशों का दौरे पर गए। इनमें कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान शामिल हैं। मोदी ने रूस में सातवें ब्रिक्स सम्मलेन में भाग लिया। अगस्त के मध्य में प्रधानमंत्री ने संयुक्त अरब अमीरात का दो दिवसीय दौरा किया। यात्रा के पहले दिन वे शेख जायद मस्जिद गए जो कि दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी मस्जिद है। सितंबर में संयुक्त राष्ट्र के दौरे पर प्रधानमंत्री मोदी ने जी-4 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। ब्रिटेन दौरे पर प्रधानमंत्री ने महारानी एलिजाबेथ और शाही परिवार के साथ भोजन किया, प्रधानमंत्री डेविड कैमरन के साथ बातचीत की और बेंबली स्टेडियम में भारतीय मूल के हजारों लोगों को संबोधित किया। तुर्की के अंताल्या में मोदी ने जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया। इस सम्मेलन को मुख्यतः पर्यावरण सम्मेलन होना था लेकिन पेरिस पर आतंकी हमले के बाद मुख्य ध्यान आतंकवाद और आईएस से लड़ने पर रहा। दिसंबर में नरेंद्र मोदी ने वार्षिक भारत-रूस सम्मेलन में भाग लेने के लिए 24-25 दिसंबर को रूस की यात्रा की।तो अफगानिस्‍तान में भारत द्वाना निर्मित नए संसद भवन का उद्घाटन किया और काबुल से लौटते वक्‍त लाहौर में रुकने का अचानक फैसले ने सबको चौका दिया। प्रधानमंत्री मोदी इन देशो को भारत में निवेश के लिए कितना रिझा पाए और मेक इन इंडिया कितना कारगर हुआ यह तो समय ही बताएगा लेकिन सूट बूट की सरकार और फ्लाइट मोड की सरकार जैसे तंज काफी चर्चे में रहे। साल के अंत में भी माहौल काफी हंगामेदार ही रहा डीडीसीए में चल रहे भ्रष्टाचार के खुलासे से आरोप प्रत्यारोप का दौर जारी है। उम्मीद करते है कि आने वाले साल में केंद्र-राज्य और सरकार-विपक्ष का आरोप प्रत्यारोप का दौर खत्म हो। देश की उन्नति के लिए, जनहित के लिए काम हो।

Saturday, 5 December 2015

भारतरत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर

भारतीय संविधान के निर्माता भारतरत्न बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर उन युग पुरुषों में से थे जो दूर का सपना देखते थे। इसी का नतीजा है कि उन्होनें एक ऐसे संविधान का गठन किया जो देश के हर व्यक्ति को समान अधिकार और दायित्व देती है। लेकिन हाल ही  में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के संविधान संशोधन द्वारा आरक्षण हटाने कि बात कहे जाने पर कैसे सरकार को चारों तरफ से घेरा गया, और उसका खामियाजा किस तरह भाजपा को बिहार चुनाव हार कर  चुकाना पडा यह किसी से छुपा नहीं है। दरसल डॉ अम्बेडकर भारत में ऐसा समाज चाहते थे जिसमें जातिवाद, वर्गवाद, सम्प्रदायवाद तथा ऊंच-नीच का भेद न हो और प्रत्येक मनुष्य अपनी योग्यता के अनुसार सामाजिक दायित्वों को पूरा करते हुए स्वाभिमान और सम्मानपूर्ण जीवन जी सके।

 14 अप्रैल 1891 को मध्य प्रदेश के एक महार जाति के रामजी मालोजी सकपाल और भीमाबाई के घर उनकी 14वीं संतान के रुप में अम्बेडकर ने जन्म लिया। अम्बेडकर के व्यक्तित्व पर उनके पिता का गहरा प्रभाव था। लेकिन वहीं विद्यालय के वातावरण का अम्बेडकर के व्यक्तित्व पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ा। अपने सवर्ण सहपाठियों के जातिगत र्दुव्‍यवहार से अम्बेडकर का मन
बहुत आहत हुआ और यही भेदभाव उनके सामाजिक चिन्तन की पीड़ा बनकर उभरा।1907 में मैट्रिक पास करने और कॉलेज में प्रवेश लेने वाले पहले अस्पृश्य भारतीय बने। इतना ही नहीं अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र जैसे कठिन विषयों की शिक्षा-दीक्षा ब्रिटेन तथा अमेरिका के विश्वविद्यालय से प्राप्त की। 1916 में अम्बेडकर को उनके शोधकार्य हेतु पी-एचडी की उपाधि से सम्मानित किया गया।

अम्बेडकर ने दलित समाज को त्रिसूत्री आचार संहिता प्रदान की जिसके तीन सूत्र हैं - शिक्षित बनो, संगठित होओ तथा संघर्ष करो। बाबा साहेब के इस मार्गदर्शन से दलित आन्दोलन भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन बन गया है। इसके परिणाम स्वरूप समाज के दबे-कुचले लोगों को संजीवनी मिली है। संक्षेप में कहे तो 31 जनवरी 1920 को बाबा साहेब ने मूकनायक पाक्षिक निकाला,1927 में महाड की चावदार झील से दलितों को पानी पीने का हक दिलाने के लिए आंदोलन चलाया और उसी साल उन्होंने ‘मनुस्मृति’ जलाई। उन्होंने 1930 में नाशिक के कलाराम मंदिर में अछूतों के प्रवेश के लिए तकरीबन डेढ़ लाख लोगों के साथ मार्च किया, लेकिन पुजारियों ने मंदिर के पट बंद कर दिए। उसके बाद विचार और कर्म के स्तर पर और संवैधानिक स्तर पर आरक्षण से लेकर उन्होंने सामाजिक न्याय के तमाम प्रयास किए और संविधान में आर्थिक लोकतंत्र की भी व्यवस्था नीति निर्देशक तत्त्वों के माध्यम से की। उन्होने श्रमिको की
दशा सुधारने के प्रयास किये, गोलमेज सम्मेलन में शामिल हुए। 1936 में उन्होने इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का गठन कर राजनीति में अपने कदम बढा दिये। बाद में फरवरी 1937 में प्रांतीय विधायिका सदन में उनकी पार्टी के 17 सदस्य चुने गये। 15 अगस्त, 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, कांग्रेस के नेतृत्व वाली नई सरकार अस्तित्व में आई तो उसने अंबेडकर को देश का पहले कानून मंत्री के रूप में सेवा करने के लिए आमंत्रित किया, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया। 29 अगस्त 1947 को अंबेडकर को स्वतंत्र भारत के नए संविधान की रचना के लिए बनी संविधान मसौदा समिति के अध्यक्ष पद पर नियुक्त किया गया और 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने संविधान को अपना लिया। अम्बेडकर ने समाज के उपेक्षित, कमजोर तथा सदियों से सामाजिक शोषण से ग्रस्त दलित वर्ग को राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य ही नहीं किया बल्कि एक समाज सुधारक की हैसियत से भी दलित वर्ग को भारतीय संविधान में समानता के कानूनी अधिकार प्रदान किए। राजनीति में आने का मकसद दलितों को उनका हक दिलाने के लिए हरसंभव प्रयास करना जिसे उन्होने किया भी। जिस तरह भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह से देश को ब्रिटिश साम्राज्यवाद की दासता से मुक्त कराया, तो दूसरी ओर अम्बेडकर ने हजारों वर्षो से उत्पीड़ित दलित वर्ग को स्वाभिमान से जीने का रास्ता दिखाया। आजादी के 68 साल बाद भी भारत में दलितों की स्थिति में वह बदलाव नहीं आया जो आना चाहिए था। अम्बेडकर ने यू हीं नहीं भरी सभा में कहा था याद रखो तुम्हारे प्रति जो सवर्णों का आकर्षण है वो प्रेम नहीं बल्कि तुम्हारे खो जाने का भय है।अम्बेडकर भलीभांति जानते थे
कि दलितों का किस तरह सवर्णो द्वारा वोट बैंक के रुप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इसलिए अम्बेडकर ने संविधान में सबको समान वोट देने का अधिकार दिया। इसी का नतिजा चुनावों के दौरान आत्म गौरव की बात जोर शोर से की जाती है और चुनाव के बाद वहीं आत्मगौरव दफना दिया जाता है। लोहिया,जयप्रकाश नारायण जैसे राजनीतिक तथा सामाजिक चिंतक भी हुए है जिन्होने पिछडो के लिए काम किया। तो अपने राजनीतिक जीवन के शुरुआती दिनों में रामविलास पासवान और मायावती जैसे नेता दलितो की हक की लडाई के लिए सदैव अग्रीम पंक्ति के नेता रहे। परंतु जैसे जैसे राजनीति में उनका दबदबा बढता गया वैसे वैसे उनका समाज के प्रति अस्तित्व घटता गया। जब सत्ता सुविधा और समझौते का रंग राजनीतिज्ञों पर पडने लगा तो आत्मगौरव की बात पीछे छूट गई। केवल राजनीतिक सत्ता हथियाने के उद्द्श्य से दलित और दूसरी अन्य पिछडी जातियों को केवल चुनाव दौरान ही याद किया जाता है। जवाब में उग्र हिंदुवाद से बचने के लिए सुरक्षा की तळाश में जिसने झासा दिया उसी को वोट दे दिया। इसका नतिजा यह हुआ कि जमीनीं स्तर पर दलितों की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं आया। यह देखने के लिए आपको ग्रामीण इलाको की ओर जाना पडेगा जहां आज भी दलितों के साथ बडी संख्या में दुर्व्यवहार किया जाता है।

अपने जीवन काल में बाबा साहब हिंदू वर्ण व्यवस्था से इस कदर परेशान हुए कि आखिरकार उन्होने हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपनाने का मन बना लिया। 14 अक्टूबर, 1956 को नागपुर में अंबेडकर ने खुद और उनके समर्थकों के लिए एक औपचारिक सार्वजनिक समारोह का आयोजन किया। अंबेडकर ने एक बौद्ध भिक्षु से पारंपरिक तरीके से तीन रत्न ग्रहण और पंचशील को अपनाते हुये बौद्ध धर्म ग्रहण किया। लम्बे समय से अंबेडकर मधुमेह से पीड़ित थे और 6 दिसंबर 1956 को दलितों को उनके हक का पाढ पढाने वाले अम्बेडकर की मृत्यु हो गई ।और जाते जाते दलितों और पिछडों को एक ब्रम्हास्त देते गये अब जरुरत है इसकी ताकत पहचानने की। भारतीय संविधान ही सब वर्गो के लोगो की आर्थिक और सामाजिक बराबरी सुनिश्चित करता है। संविधान बाबा साहेब के चितंन का एक जीवंत दस्तावेज है, जो कि भारत जैसे देश को स्थायी रूप से संभाल सकता है।

Wednesday, 2 December 2015

तमाशा

एक फिल्म जिसमे हसी-मजाक के साथ साथ एक दर्द को दिखाया गया है। जिससे हर कोई कभी न कभी गुजरता ही है। यह समय होता है जब प्रेमी एक-दूसरे को चाहते भी हैं और दुनिया को और खुद को ये जताना चाहते हैं कि प्यार नहीं भी है। अभिनय के दौरान दीपिका और रणबीर ने शत प्रतिशत अंजाम दिया है. कुछ ऐसे सीन हैं जहां अल्फाज तो नहीं हैं लेकिन चेहरे के भाव देखकर ही हंसी आ जाती है तो कहीं भीतर का गम भी बाहर निकलता है।

एक बच्चा है वेद (रणबीर) उसकी दिलचस्पी कहानियां सुनने में है। बचपन से वो कहानियां सुनने के लिए पैसे भी चुराता हैयहीं पर बच्चें के दिमाग में बात डाली जाती है कि सारी कहानी एक सी ही होती है बस पात्र अलग। वह अपनी ही दुनिया में जीता है लेकिन जैसा कि फिल्मों में भी होता है और हकीकत में भी, पिता हकीकत में रहना वाला है तो वह बेटे से उम्मीद करता है कि वह पढ़ाई पर फोकस करे। कहानी आगे बढ़ती है और फिर वेद की फ्रांस में तारा (दीपिका)  से मुलाकात होती है। फिर दोनों का सफर शुरू हो जाता है। कुछ एहसास जगते हैं यहीं पर फिल्म का निर्देशक प्रवेश करता है और कहानी को ट्विस्ट देता है। दोनो एक दूसरे को चाहते तो हैं, लेकिन दिखावा ये करते हैं कि उनके बीच प्रेम नाम की किसी चिड़िया का अस्तित्व नहीं है। तो दोनों अपने देश वापस लौट जाते हैं। फिर चार साल बाद दोनों की मुलाकात होती है। फिर दोनों एक दूसरे को समझने लगते हैं। पर तारा ये महसूस करती है कि ये वो वेद नहीं है, जो कोर्सिका में मिला था। वो वेद को झिड़कती है औऱ कहती है कि वो बदल गया है और बोरिंग हो गया है। वह वेद को यह एहसास दिलाती है कि कॉरपोरेट जीवन में मैनेजर की भूमिका में वो अपनी जिंदगी का मकसद भूल गया है। लगभग ढाई घंटे की फिल्म में इम्तियाज सफर को खत्म ही नहीं होने देते कभी यह सफर जिंदगी का होता है तो कभी रिश्तों का। अच्छे नजारे जरूर देखने को मिलते हैं। फ्लैश बैक और हाल फिलहाल में चल रही कहानी में दोहराव कई जगह पर नजर आता है जिससे कहीं-कहीं बीच में अपनी पकड़ खोती नजर आती है।हालांकि फिल्म में युवा तेवर और युवाओं की मानसिकता के साथ कदमताल की कोशिश अच्छी है।कुल मिलाकर फिल्म के निर्देशन में वाकई में कुछ अलग और नया कर दिखाने पूरा प्रयास किया गया है।